” कवि रसखान का श्रीकृष्ण प्रेम “

या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिंहु पुर को तजि डारौं! आठहुँ सिद्धि, नवो निधि को सुख, नंद की धेनु चराय बिसारौं !! रसखान कबौं…

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” वो लोग बहुत प्यार करने वाले थे “

वो  लोग  मेरे  बहुत  प्यार  करने  वाले   थे गुज़र गए हैं  जो  मौसम  गुजरने  वाले  थे   नई रुतों  में  दुखों  के  भी सिलसिले  हैं …

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” जगहें खत्म हो जाती हैं……”

जगहें  खत्म हो जाती  हैं जब  हमारी  वहाँ  जाने  की  इच्छाएं खत्म  हो  जाती  हैं लेकिन  जिनकी इच्छाएँ  खत्म  हो  जाती हैं वे  ऐसी  जगहों …

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