” राखी का धागा “

द्वापर युग की बात है। एक बार भगवान श्रीकृष्ण शिशुपाल का वध करने के बाद लौट रहे थे। उसी समय सुदर्शन चक्र चलाते हुए श्रीकृष्ण की उंगली में चोट लग गई और उससे रक्त बहने लगा।

वहाँ उपस्थित सभी लोग भगवान की सेवा में दौड़ पड़े, लेकिन तभी द्रौपदी की नजर श्रीकृष्ण की घायल उंगली पर पड़ी। वह अपने वस्त्र का एक छोटा-सा टुकड़ा फाड़कर श्रीकृष्ण की उंगली पर बाँधने लगी।

श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए द्रौपदी से कहा—

“सखी! तुमने मेरे घाव पर यह कपड़ा बाँधकर मुझे अपना ऋणी बना लिया है। मैं तुम्हारा यह उपकार कभी नहीं भूलूँगा।”

द्रौपदी ने हँसते हुए कहा—

“भैया, इसमें उपकार कैसा? भाई की उंगली पर बहन पट्टी नहीं बाँधेगी तो कौन बाँधेगा?”

द्रौपदी के इन शब्दों ने श्रीकृष्ण के हृदय को छू लिया। उन्होंने उसी क्षण मन-ही-मन अपनी बहन की रक्षा का संकल्प लिया।

समय बीतता गया।

एक दिन हस्तिनापुर की राजसभा में द्रौपदी का अपमान किया जाने लगा। कौरवों ने द्रौपदी को भरी सभा में खींचकर लाया और उसका चीरहरण करने का प्रयास किया। द्रौपदी ने सभा में उपस्थित सभी बड़े-बुजुर्गों से सहायता माँगी, लेकिन कोई आगे नहीं आया।

आखिरकार उसने अपने दोनों हाथ उठाकर भगवान श्रीकृष्ण को पुकारा—

“हे कृष्ण! अब मेरी लाज आपके हाथ में है।”

द्रौपदी की पुकार सुनते ही श्रीकृष्ण ने उसकी लाज बचाई। द्रौपदी का वस्त्र इतना बढ़ता गया कि दुःशासन उसे खींचते-खींचते थक गया, लेकिन वस्त्र समाप्त नहीं हुआ।

द्रौपदी समझ गई कि यह उसके उस छोटे-से कपड़े का प्रतिफल था, जो उसने कभी श्रीकृष्ण की घायल उंगली पर बाँधा था।

श्रीकृष्ण ने उस दिन अपना भाई होने का धर्म निभाया।

इसी घटना को रक्षाबंधन की भावना से जोड़कर देखा जाता है। यह पर्व केवल भाई की कलाई पर धागा बाँधने का नाम नहीं है, बल्कि विश्वास, प्रेम, सम्मान और जीवनभर एक-दूसरे की रक्षा करने के संकल्प का पर्व है।

राखी का धागा देखने में बहुत कमजोर होता है, लेकिन उसमें भावनाओं की ऐसी शक्ति होती है जो भाई-बहन के रिश्ते को जीवनभर मजबूत बनाए रखती है।

कहते हैं—

“राखी का धागा छोटा जरूर होता है,
लेकिन उसमें बहन की दुआ और भाई की जिम्मेदारी बंधी होती है।”

आज भी जब बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती है, तो वह केवल एक धागा नहीं बाँधती, बल्कि अपने बचपन की यादें, अपना प्रेम, अपनी उम्मीदें और भाई की लंबी उम्र की प्रार्थना भी बाँध देती है।

और भाई भी केवल उपहार देकर अपना कर्तव्य पूरा नहीं करता, बल्कि यह संकल्प लेता है कि चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों, वह अपनी बहन के सम्मान, सुख और सुरक्षा के लिए हमेशा उसके साथ खड़ा रहेगा।

यही रक्षाबंधन का सच्चा अर्थ है—
एक धागा, जो रिश्ते को नहीं बाँधता,
बल्कि दो दिलों को जीवनभर के लिए जोड़ देता है।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार      !

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