बरसात का मौसम था। आसमान में काले बादल छाए हुए थे और हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। शहर के एक बड़े अधिकारी, जिन्हें सभी “साहब” कहकर बुलाते थे, अपने ऑफिस में बैठे थे। काम का दबाव, मीटिंग्स और फाइलों के बीच उनका मन बहुत बेचैन हो गया था। उन्होंने सोचा कि आज कुछ देर के लिए ऑफिस से बाहर निकलकर मन को हल्का किया जाए।
उन्हें शहर के बाहर सड़क किनारे स्थित एक छोटा-सा ढाबा याद आया, जहाँ वे कभी-कभी खाना खाने जाया करते थे। वहाँ का खाना उन्हें बेहद पसंद था। न जाने उस साधारण से ढाबे में ऐसा क्या था कि वहाँ जाते ही उनके मन को सुकून मिल जाता था।
साहब अपनी कार लेकर ढाबे पर पहुँच गए। जैसे ही वे अंदर आए, ढाबे का नौजवान कर्मचारी रामू दौड़ता हुआ आया। उसने मुस्कुराते हुए पानी का गिलास मेज पर रखा और बोला, “नमस्ते साहब! आज बहुत दिनों बाद दर्शन हुए।”
साहब मुस्कुराए और बोले, “हाँ रामू, कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर गया हुआ था।”
“कोई बात नहीं साहब, आप बैठिए। मैं अभी आपके लिए कुछ खास लेकर आता हूँ।”
साहब ने कोई ऑर्डर नहीं दिया। उन्हें पता था कि रामू उनकी पसंद अच्छी तरह जानता है। कुछ ही मिनटों में गरमा-गरम आलू के पकोड़े और हरी चटनी मेज पर आ गए। बाहर बारिश और सामने गरम पकोड़े देखकर साहब का चेहरा खिल उठा।
“वाह रामू! तू तो सच में जादूगर है। इस मौसम में इससे अच्छा और क्या हो सकता है?” साहब ने खुश होकर कहा।
रामू हँसते हुए बोला, “साहब, अभी तो अदरक वाली चाय भी आ रही है।”
खाना खाते-खाते साहब का सारा तनाव दूर हो गया। हर निवाला उन्हें घर जैसा स्वाद दे रहा था। कई वर्षों से वे इस ढाबे पर आते थे, लेकिन एक बात हमेशा उनके मन में रहती थी—आखिर वह रसोइया कौन है जो इतना स्वादिष्ट भोजन बनाता है?
उन्होंने कई बार रामू से पूछा था, लेकिन हर बार वह बात टाल देता था।
आज साहब ने दृढ़ निश्चय कर लिया।
“रामू, आज मैं उस बावर्ची से मिले बिना नहीं जाऊँगा। मुझे उसका धन्यवाद करना है।”
रामू थोड़ा घबरा गया और बोला, “साहब, रहने दीजिए न…”
लेकिन इस बार साहब नहीं माने। वे उठे और सीधे रसोई की ओर बढ़ गए।
रसोई में पहुँचकर उन्होंने जो दृश्य देखा, उसे देखकर उनके कदम वहीं रुक गए।
एक वृद्ध महिला चूल्हे के पास खड़ी चाय बना रही थी। चेहरे पर झुर्रियाँ थीं, बाल सफेद हो चुके थे, लेकिन आँखों में ममता की चमक वैसी ही थी।
साहब की आँखें फैल गईं।
उनके होंठ काँपे और अचानक उनके मुँह से निकला—
“माँ…!”
वृद्ध महिला ने पीछे मुड़कर देखा। उनकी आँखें भर आईं।
साहब की आँखों से आँसू बहने लगे।
“माँ! आप यहाँ…? मैंने तो आपको वृद्धाश्रम में छोड़ दिया था…”
महिला ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ बेटा, तुमने मुझे वृद्धाश्रम में छोड़ दिया था। वहाँ रहने को जगह थी, खाने को भोजन था, लेकिन दिल को सुकून नहीं था।”
साहब चुपचाप सुनते रहे।
माँ ने आगे कहा, “एक दिन रामू वहाँ आया था। उसने मुझे पहचान लिया। उसने कहा कि मैं उसके ढाबे में आकर खाना बनाऊँ। तब से मैं यहीं हूँ।”
साहब की आँखें झुक गईं।
माँ ने प्रेम से कहा, “बेटा, जब भी तू यहाँ आकर खाना खाता था, मैं रसोई से तुझे देख लेती थी। तेरी पसंद आज भी मुझे याद है। कौन सी सब्ज़ी पसंद है, कितनी मिर्च खाता है, बारिश में पकोड़े अच्छे लगते हैं—एक माँ अपने बच्चे की पसंद कभी नहीं भूलती।”
अब साहब फूट-फूटकर रोने लगे।
उन्हें समझ आ गया कि इस ढाबे का स्वाद मसालों में नहीं, बल्कि माँ के प्रेम में था। यही कारण था कि रामू को उनकी हर पसंद पता होती थी और उनसे कम पैसे लिए जाते थे।
उस दिन साहब अपनी माँ को सम्मानपूर्वक अपने घर वापस ले गए। वर्षों बाद उनके घर में फिर से रौनक लौट आई। उन्हें समझ आ गया कि दुनिया का सबसे बड़ा धन माँ-बाप का प्यार होता है।
माता-पिता जीवन का वह अनमोल खजाना हैं, जिनकी कीमत अक्सर उनके दूर होने पर समझ आती है। दुनिया का कोई भी सुख, धन या पद माँ-बाप के प्रेम और आशीर्वाद की बराबरी नहीं कर सकता।
जो अपने माता-पिता का सम्मान करता है, उनकी सेवा करता है और उन्हें अपने जीवन में स्थान देता है, वही वास्तव में सबसे बड़ा और सबसे धनवान इंसान है।
“माँ के हाथों के खाने में स्वाद नहीं, ममता घुली होती है; और ममता का कोई मूल्य नहीं होता।”
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
