शहर के एक शांत मोहल्ले में रमेश नाम का एक युवक प्रतिदिन घर-घर समाचार-पत्र पहुँचाया करता था। एक दिन उसने देखा कि एक बुज़ुर्ग व्यक्ति के घर की डाक-पेटी पूरी तरह भर चुकी थी। समाचार-पत्र डालने की जगह न होने के कारण रमेश ने दरवाज़ा खटखटाया।
कुछ क्षण बाद लगभग अस्सी वर्ष के श्री बनर्जी ने धीरे-धीरे दरवाज़ा खोला।
रमेश ने पूछा, “बाबूजी, आपकी डाक-पेटी इतनी भरी हुई है। क्या आप समाचार-पत्र नहीं पढ़ते?”
बनर्जी जी मुस्कुराए और बोले, “नहीं बेटा, मैं समाचार-पत्र पढ़ने के लिए नहीं मंगवाता।”
रमेश को आश्चर्य हुआ। उसने पूछा, “फिर प्रतिदिन समाचार-पत्र क्यों लेते हैं?”
बुज़ुर्ग ने कुछ क्षण चुप रहकर कहा, “मैं चाहता हूँ कि तुम प्रतिदिन मेरा दरवाज़ा खटखटाओ, घंटी बजाओ और समाचार-पत्र मुझे अपने हाथों से दो।”
रमेश ने कहा, “लेकिन बाबूजी, इससे आपका भी समय जाएगा और मेरा भी।”
बनर्जी जी ने उसकी ओर देखते हुए कहा, “मैं तुम्हें हर महीने पाँच सौ रुपये अतिरिक्त दूँगा। इसे समाचार-पत्र पहुँचाने का नहीं, बल्कि मेरे दरवाज़े पर दस्तक देने का शुल्क समझ लेना।”
रमेश ने हँसते हुए पूछा, “इतनी-सी बात के लिए आप पाँच सौ रुपये क्यों देंगे?”
इस बार बुज़ुर्ग की आँखों की चमक अचानक बुझ गई। उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, “क्योंकि मेरे घर में अब कोई नहीं रहता, बेटा।”
उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी का कई वर्ष पहले निधन हो चुका है और उनका बेटा विदेश में रहता है !बड़ा-सा घर है, लेकिन उसमें अब केवल उनकी साँसों की आवाज़ गूँजती है !
फिर उन्होंने रमेश का हाथ पकड़कर कहा, “मुझसे एक और वादा करोगे?”
“जी, बताइए।”
“जिस दिन तुम मेरा दरवाज़ा खटखटाओ और मेरी ओर से कोई उत्तर न मिले, उस दिन पुलिस को सूचना देना। मेरे बेटे को भी यह खबर दे देना। हो सकता है, उस दिन मैं इस दुनिया में न रहूँ।”
रमेश स्तब्ध रह गया।
बनर्जी जी की आँखों से आँसू बह निकले।
उन्होंने कहा, “मैं समाचार-पत्र नहीं पढ़ता। मुझे तो बस तुम्हारे कदमों की आहट सुननी होती है। दरवाज़े पर दस्तक होती है तो लगता है कि आज भी कोई मुझे याद करता है। कोई चेहरा सामने आता है तो लगता है कि मैं अभी इस दुनिया के लिए अनजान नहीं हुआ हूँ।”
उस दिन रमेश को समझ आया कि कभी-कभी मनुष्य वस्तु नहीं खरीदता, वह अपनापन खरीदता है।
उसके बाद रमेश प्रतिदिन समय निकालकर बनर्जी जी के दरवाज़े पर दस्तक देता। कुछ मिनट उनके पास बैठता, हालचाल पूछता और फिर आगे बढ़ जाता।
समय बीतता गया। एक दिन रमेश ने हमेशा की तरह दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन भीतर से कोई आवाज़ नहीं आई। उसने दोबारा दस्तक दी। फिर घंटी बजाई। फिर भी कोई उत्तर नहीं मिला।
उस दिन बनर्जी जी जा चुके थे।
रमेश की आँखों में आँसू आ गए। उसने पुलिस को सूचना दी और उनके बेटे को भी खबर दी।
उस दिन उसे पाँच सौ रुपये नहीं मिले, लेकिन जीवन की सबसे बड़ी सीख मिली—
किसी अकेले बुज़ुर्ग के दरवाज़े पर की गई छोटी-सी दस्तक भी उसके लिए जीवन का प्रमाण बन सकती है।
आज हम संदेश भेजकर समझते हैं कि हमने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया। लेकिन कभी-कभी एक संदेश से अधिक मूल्यवान होता है—किसी के पास बैठना, उसका हाल पूछना और यह एहसास कराना कि “आप अकेले नहीं हैं।”
इसलिए अपने परिवार और आसपास रहने वाले बुज़ुर्गों को समय दीजिए। सुबह का एक संदेश, शाम का एक फोन और कभी-कभी घर जाकर मिल लेना—इन छोटी-छोटी बातों में बहुत बड़ा स्नेह छिपा होता है।
जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है;
जिसका मन प्रसन्न है, उसके पास ही वास्तविक संपत्ति है।
किसी के दरवाज़े पर दस्तक देते रहिए,
क्योंकि हो सकता है वह दरवाज़ा किसी घर का नहीं,
किसी अकेले हृदय का दरवाज़ा हो।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
