एक समय की बात है। एक नगर में एक व्यक्ति रहता था। वह धार्मिक स्वभाव का था और धर्म-कर्म में उसकी गहरी आस्था थी। वह नियमित रूप से पूजा-पाठ करता, जरूरतमंदों की सहायता करता और अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा परोपकार के कार्यों में लगा देता था। उसका विश्वास था कि अच्छे कर्म करने से मृत्यु के बाद उसे निश्चित रूप से स्वर्ग की प्राप्ति होगी।
लेकिन उसके भीतर एक कमी भी थी—अहंकार। जैसे-जैसे वह दूसरों की सहायता करता गया, उसके मन में यह भावना बढ़ती गई कि वह दूसरों से अधिक धर्मात्मा और श्रेष्ठ है। वह अपने परोपकार का उल्लेख लोगों के सामने करता और मन ही मन यह सोचता कि स्वर्ग पर उसका अधिकार बन चुका है।
एक दिन नगर में एक प्रसिद्ध संत का आगमन हुआ। वह व्यक्ति संत को अपने घर ले आया और बड़े उत्साह से उनकी सेवा करने लगा। भोजन कराया, विश्राम की व्यवस्था की और उनके चरणों में बैठकर बोला, “महाराज! मैं जीवन भर धर्म-कर्म और परोपकार करता रहा हूँ। मुझे स्वर्ग की प्राप्ति के लिए और क्या करना चाहिए?”
संत ने उसकी ओर ध्यान से देखा और कुछ क्षण शांत रहने के बाद बोले, “तुम स्वर्ग जाओगे? मुझे तो ऐसा नहीं लगता। तुम्हारे भीतर अभी बहुत अहंकार है। तुम स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझते हो। ऐसे मन के साथ स्वर्ग की प्राप्ति कैसे होगी?”
संत की बात सुनते ही उस व्यक्ति का क्रोध भड़क उठा। उसने अपना आपा खो दिया और संत को कठोर शब्द बोलने लगा !
संत फिर भी शांत रहे। वे मुस्कुराते हुए बोले, “देखो, अभी मैंने तुम्हारे अहंकार को छुआ तो तुम्हारा क्रोध बाहर आ गया। तुम दूसरों के लिए इतना कुछ करते हो, लेकिन अपने भीतर के क्रोध, अहंकार और अधीरता को दूर करने का प्रयास नहीं करते। बताओ, ऐसी स्थिति में स्वर्ग कहाँ मिलेगा?”
संत के शब्द उस व्यक्ति के हृदय में गहराई तक उतर गए। उसे अपनी भूल का अनुभव हुआ। वह किये गए दुर्व्यवहार के लिए संत से हाथ जोड़कर क्षमा माँगने लगा।
संत ने उससे शांत शब्दों में कहा, “स्वर्ग कोई ऐसी जगह नहीं है, जहाँ केवल अच्छे कर्मों की संख्या गिनकर प्रवेश मिलता हो। सच्चा स्वर्ग तो उस मन में बनता है, जिसमें अहंकार के स्थान पर विनम्रता, क्रोध के स्थान पर शांति, स्वार्थ के स्थान पर सेवा और घृणा के स्थान पर प्रेम हो।”
उस दिन से उस व्यक्ति ने केवल दूसरों की सहायता करना ही नहीं, बल्कि अपने भीतर सुधार करना भी शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उसका अहंकार कम होने लगा और उसके व्यवहार में विनम्रता तथा धैर्य आने लगा। अब वह किसी पर उपकार करने की भावना से नहीं, बल्कि मनुष्य होने के नाते दूसरों की सहायता करता था।
केवल अच्छे कर्म करना ही पर्याप्त नहीं है। मनुष्य को अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ और अधीरता को भी दूर करना चाहिए। जिस दिन हमारा मन प्रेम, शांति, संतोष और विनम्रता से भर जाएगा, उसी दिन हमें स्वर्ग की अनुभूति इसी धरती पर होने लगेगी।
सच्चा स्वर्ग कहीं बाहर नहीं, हमारे अपने विचारों, व्यवहार और कर्मों में छिपा है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
