एक बार एक प्रतापी राजा ने अपने राज्य के सभी प्रसिद्ध विद्वान ज्योतिषियों की सभा बुलवाई। सभा में पहुँचते ही राजा ने एक गंभीर प्रश्न रखा—
“मेरी जन्मकुंडली के अनुसार मेरा राजा बनने का प्रबल योग था, और मैं राजा बना भी। परंतु उसी घड़ी-मुहूर्त में मेरे साथ न जाने कितने अन्य बालक भी जन्मे होंगे, किंतु वे राजा क्यों नहीं बन सके? जब समय, ग्रह-नक्षत्र और मुहूर्त समान थे, तो भाग्य में यह भेद क्यों?”
राजा का यह प्रश्न सुनकर समस्त ज्योतिषी मौन हो गए। किसी के पास कोई संतोषजनक उत्तर नहीं था। सभा में एक गहन निस्तब्धता छा गई। तभी एक वृद्ध विद्वान उठे और विनम्र स्वर में बोले—
“महाराज, इस प्रश्न का उत्तर यहाँ संभव नहीं। नगर से कुछ दूर घने वन में एक महात्मा तपस्या में लीन हैं, संभव है वे आपकी जिज्ञासा शांत कर सकें।”
राजा ने बिना विलंब किए वन की ओर प्रस्थान किया। घने जंगल में पहुँचकर उन्होंने जो दृश्य देखा, वह अत्यंत विचित्र था। एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठे हुए जलते हुए अंगारों को भोजन की भाँति खा रहे थे। राजा यह देखकर विस्मित रह गए और साहस जुटाकर अपना प्रश्न पूछ बैठा।
महात्मा ने क्रोधित दृष्टि से राजा की ओर देखा और कहा—
“तेरे प्रश्न का उत्तर मेरे पास नहीं। आगे पहाड़ियों के बीच एक और महात्मा हैं, वही इसका उत्तर दे सकते हैं।”
राजा की जिज्ञासा अब और भी प्रबल हो चुकी थी। कठिन पहाड़ी मार्ग पार करते हुए, अनेक कष्ट सहकर वे दूसरे महात्मा के पास पहुँचे। वहाँ का दृश्य तो और भी भयावह था। वह महात्मा अपने ही शरीर का मांस चिमटे से नोच-नोचकर खा रहे थे।
राजा भय और करुणा से काँप उठा। उन्होंने जैसे ही प्रश्न करना चाहा, महात्मा ने कठोर स्वर में कहा—
“मैं भूख से व्याकुल हूँ, मेरे पास समय नहीं। आगे एक आदिवासी गाँव है। वहाँ एक बालक जन्म लेने वाला है, जो कुछ ही क्षण जीवित रहेगा। वही तेरे प्रश्न का उत्तर देगा।”
राजा की व्याकुलता अब चरम पर थी। वे शीघ्र ही उस आदिवासी गाँव पहुँचे और दंपत्ति को सारी बात बताई। कुछ ही समय बाद एक बालक ने जन्म लिया। दंपत्ति उसे नाल सहित राजा के समक्ष ले आए।
अचरज की बात यह थी कि वह नवजात बालक राजा को देखते ही मुस्कुराया और बोलने लगा—
“राजन्, मेरे पास भी अधिक समय नहीं है, परंतु तुम्हारे प्रश्न का उत्तर सुन लो।
तुम, मैं और वे दोनों महात्मा—हम सात जन्म पहले चारों सगे भाई थे और राजकुमार थे।”
बालक ने आगे कहा—
“एक बार हम चारों भाई शिकार खेलते-खेलते जंगल में भटक गए। तीन दिन तक हम भूखे-प्यासे रहे। तभी हमें आटे की एक पोटली मिली। हमने उससे चार बाटियाँ बनाईं और आग पर सेंक लीं।
जैसे ही हम खाने बैठे, तभी एक भूखा-प्यासा महात्मा वहाँ आ पहुँचा। उसने पहले उस भाई से याचना की, जो आज अंगार खा रहा है—
‘बेटा, मैं दस दिनों से भूखा हूँ, अपनी बाटी में से थोड़ा दे दो।’
उस भाई ने क्रोध में उत्तर दिया—
‘तुझे दे दूँ तो मैं क्या खाऊँ, आग?’
और उसे भगा दिया।
फिर वह महात्मा दूसरे भाई के पास गया, जो आज अपना मांस खा रहा है। उसने भी क्रोधपूर्वक कहा—
‘यदि तुझे दे दूँ, तो क्या मैं अपना मांस नोचकर खाऊँ?’
वह महात्मा मेरे पास आया, मैंने भी स्वार्थवश उसे मना कर दिया।
अंततः वह तुम्हारे पास आया, हे राजन्। तुमने दया और प्रेम से अपनी बाटी का आधा भाग उसे अर्पित कर दिया।”
बालक बोला—
“तब उस महात्मा ने प्रसन्न होकर कहा था—
‘तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से निर्मित होगा।’
आज उसी कर्म का फल हम सब भोग रहे हैं।” इतना कहकर वह बालक मुस्कुराया… और प्राण त्याग गया।
राजा स्तब्ध रह गया। उसकी आँखें खुल चुकी थीं।
धरती पर एक ही समय में अनेक फूल खिलते हैं, किंतु सबका रंग, रूप, सुगंध और आकार समान नहीं होता। उसी प्रकार एक ही समय में जन्म लेकर भी सभी का भाग्य समान नहीं होता, क्योंकि कर्म समान नहीं होते।
मनुष्य वही पाता है—
जो उसने किया,
जो उसने दिया,
और जो उसने लिया।
यह कहानी हमें सिखाती है कि केवल जन्म-समय, भाग्य या ग्रह-नक्षत्र ही हमारे जीवन का निर्धारण नहीं करते, बल्कि हमारे कर्म, व्यवहार, करुणा और संवेदनशीलता ही हमारे भविष्य की वास्तविक नींव होते हैं। जिस प्रकार गलत पासवर्ड से एक छोटा-सा मोबाइल भी नहीं खुलता, उसी प्रकार गलत कर्मों से मोक्ष, सुख या स्वर्ग के द्वार नहीं खुलते। दया, त्याग और मानवता ही वे बीज हैं, जिनसे उज्ज्वल भविष्य का वृक्ष फलता-फूलता है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
