” मन की नीयत परमात्मा से नहीं छिपती “

सतयुग का समय था। चारों ओर धर्म, सत्य और करुणा का साम्राज्य था। घने जंगलों के बीच बसे एक छोटे से आश्रम में एक वृद्ध साध्वी रहती थीं। उनका जीवन भगवान के भजन, तप और सेवा में बीतता था। एक दिन उन्होंने निश्चय किया कि वे दूर स्थित महर्षि के आश्रम में यज्ञ में सम्मिलित होने जाएँगी।

अपने साथ उन्होंने एक छोटी-सी गठरी ली, जिसमें कुछ फल, सूखे मेवे, वस्त्र और यज्ञ के लिए समर्पित स्वर्ण मुद्राएँ थीं। वृद्धावस्था के कारण उनके कदम धीमे थे। दोपहर की धूप तेज़ हो गई और लंबी यात्रा से वे थककर एक विशाल पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गईं।

उसी समय एक तेजस्वी युवक घोड़े पर सवार होकर उधर से निकला। वह देखने में बलवान और विनम्र प्रतीत होता था। वृद्ध साध्वी ने उसे आवाज़ देकर कहा, “वत्स! यदि तुम्हारा मार्ग भी महर्षि के आश्रम की ओर है तो मेरी यह गठरी अपने घोड़े पर रख लो। मैं धीरे-धीरे पहुँच जाऊँगी। इससे मुझे चलने में सुविधा होगी।”

युवक ने कहा, “माते, आप बहुत धीरे चल रही हैं। मैं तो थोड़ी ही देर में आश्रम पहुँच जाऊँगा। वहाँ आपके आने तक कैसे प्रतीक्षा करूँ? क्षमा कीजिए, मैं आपकी सहायता नहीं कर पाऊँगा।”

इतना कहकर वह आगे बढ़ गया।

कुछ दूर जाने के बाद उसके मन में लोभ जाग उठा। उसने सोचा, “इस वृद्धा की गठरी में अवश्य कोई बहुमूल्य वस्तु होगी। यदि मैं उसे लेकर चला जाऊँ तो मुझे कौन पहचान पाएगा? मैंने तो बिना सोचे-समझे अवसर खो दिया।”

वह तुरंत घोड़ा मोड़कर वापस आया और बोला, “माते! मुझे अपनी भूल का एहसास हो गया। आप अपनी गठरी मुझे दे दीजिए। मैं आश्रम पहुँचकर आपकी प्रतीक्षा करूँगा।”

वृद्ध साध्वी ने उसकी आँखों में देखा और शांत स्वर में बोलीं, “नहीं पुत्र, अब इसकी आवश्यकता नहीं है। मैं इसे स्वयं ही ले जाऊँगी।”

युवक आश्चर्यचकित होकर बोला, “अभी कुछ समय पहले तो आप स्वयं मुझे गठरी देने का आग्रह कर रही थीं। अब अचानक मना क्यों कर रही हैं?”

साध्वी मुस्कराईं और बोलीं, “वत्स, जब तुम पहली बार आए थे तब तुम्हारे मन में सेवा का भाव नहीं था, केवल जल्दी पहुँचने की चिंता थी। जब तुम लौटकर आए, तब तुम्हारे मन में सेवा नहीं, लोभ बैठ चुका था। मनुष्य चाहे अपने विचार छिपा ले, लेकिन मन की तरंगें सामने वाले के हृदय तक पहुँच जाती हैं। और सबसे बढ़कर, जो परमात्मा तुम्हारे भीतर विराजमान हैं, वही मेरे भीतर भी हैं। उनसे कोई भी नीयत छिप नहीं सकती।”

यह सुनते ही युवक का सिर शर्म से झुक गया। उसने वृद्ध साध्वी के चरणों में गिरकर क्षमा माँगी। उसी क्षण उसने प्रण लिया कि जीवन में कभी भी लालच को अपने मन पर हावी नहीं होने देगा और सदैव निष्काम भाव से दूसरों की सेवा करेगा।

मन की पवित्रता ही सबसे बड़ा धन है। हमारी नीयत और विचार सबसे पहले भगवान देखते हैं। इसलिए सदैव अच्छे विचार रखें, निष्काम सेवा करें और हर व्यक्ति के प्रति सम्मान तथा सद्भाव का भाव रखें। यही सच्चा धर्म है।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार      !

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