दो घनिष्ठ मित्र थे। एक दिन दोनों के बीच एक अनोखी शर्त लग गई। पहले मित्र ने कहा, “अगर तुम पूरे एक महीने तक बिना किसी इंसान से मिले, बिना किसी से बातचीत किए एक कमरे में अकेले रह सकते हो, तो मैं तुम्हें दस लाख रुपये दूंगा।”
दूसरे मित्र ने बिना ज्यादा सोचे शर्त स्वीकार कर ली।
उसे शहर से दूर एक सुनसान मकान के कमरे में बंद कर दिया गया। कमरे में एक बिस्तर, कुछ किताबें और दिन में दो बार भोजन की व्यवस्था थी। जाने से पहले उसे समझा दिया गया, “अगर कभी तुम्हें लगे कि अब तुम अकेले नहीं रह सकते, तो बस यह घंटी बजा देना। हम तुरंत तुम्हें बाहर निकाल लेंगे।”
पहले दो दिन उसने किताबें पढ़कर समय काट लिया। लेकिन तीसरे दिन से उसे अकेलापन खलने लगा। उसे किसी से बात करने की इच्छा होती, किसी का चेहरा देखने को मन करता। धीरे-धीरे बेचैनी बढ़ती गई।
दिन गुजरते गए और अकेलेपन की पीड़ा असहनीय होने लगी। कभी वह कमरे में चिल्लाता, कभी रोता, कभी गुस्से में दीवारों पर हाथ मारता। कई बार उसका हाथ घंटी तक पहुंचा, लेकिन हर बार दस लाख रुपये का ख्याल आते ही वह रुक जाता।
“मुझे यह शर्त हर हाल में जीतनी है,” वह स्वयं से कहता।
एक-एक दिन जैसे एक-एक वर्ष बनकर गुजर रहा था।
लेकिन कुछ दिनों बाद उसके भीतर अचानक एक परिवर्तन आने लगा। उसका क्रोध कम होने लगा। बेचैनी शांत होने लगी। अब वह घंटों चुपचाप बैठा रहता। फिर उसने ध्यान करना शुरू किया। वह अपने जीवन के बारे में सोचने लगा—वह किन चीजों के पीछे भागता रहा, कितनी इच्छाएं उसने अपने भीतर पाल रखी थीं और कितनी छोटी-छोटी बातों के कारण परेशान रहता था।
धीरे-धीरे उसके भीतर ऐसी शांति उतरने लगी, जिसे उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था।
उधर उसका मित्र बाहर से उसकी खबर रख रहा था। जब एक महीना पूरा होने में केवल दो दिन बाकी रह गए, तभी उसका व्यापार बुरी तरह डूब गया। वह दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गया। अब उसे दस लाख रुपये देने की चिंता सताने लगी।
उसने लालच और भय में आकर अपने मित्र को रास्ते से हटाने का खतरनाक निर्णय लिया और उसे मारने के इरादे से उस मकान की ओर चल पड़ा।
लेकिन वहां पहुंचकर वह स्तब्ध रह गया।
कमरा खाली था। उसका मित्र एक दिन पहले ही वहां से जा चुका था। मेज पर केवल एक पत्र रखा था।
पत्र में लिखा था—
“प्रिय मित्र, इन दिनों मैंने वह पा लिया है, जिसकी कीमत दस लाख रुपये तो क्या, संसार की कोई दौलत नहीं चुका सकती। मैंने जाना कि हमारी जरूरतें जितनी कम होती जाती हैं, मन उतना ही शांत होता जाता है। मैंने अकेलेपन में स्वयं को जाना और उसी मौन में परमात्मा के प्रेम को महसूस किया।
अब मुझे तुम्हारे दस लाख रुपये की कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए मैं स्वयं यह शर्त समाप्त कर रहा हूं।
मुझे धन नहीं, शांति मिल गई है… और यही मेरे जीवन की सबसे बड़ी जीत है।”
हम जीवनभर सुख पाने के लिए बाहर की चीजों के पीछे भागते रहते हैं, जबकि सच्ची शांति हमारे भीतर छिपी होती है। इच्छाएं कम हों तो मन हल्का होता है और मन शांत हो तो साधारण जीवन भी आनंद से भर जाता है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
