नित्या एक साधारण परिवार की लड़की थी। उसे सजना-संवरना, तस्वीरें खींचना और छोटी-छोटी खुशियों को जीना बहुत पसंद था। एक दिन वह अपनी सहेली की मैरिज पार्टी में गई। गुलाबी रंग की साड़ी में वह बेहद खूबसूरत लग रही थी। सभी ने उसकी तारीफ की। उसने कई सेल्फियाँ लीं और घर आकर बड़े उत्साह से अपनी सबसे सुंदर तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दी।
तस्वीर पोस्ट करते समय उसके चेहरे पर मुस्कान थी। उसे पूरा विश्वास था कि कुछ ही घंटों में सैकड़ों लाइक्स और तारीफों की बाढ़ आ जाएगी।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
सुबह उठते ही उसने सबसे पहले मोबाइल उठाया। पोस्ट खोली… सिर्फ पाँच लाइक्स। उसने खुद को समझाया—”अभी लोग सो रहे होंगे।”
दोपहर हुई। बार-बार मोबाइल देखती रही। लाइक्स मुश्किल से दस हुए थे। कुछ लोगों ने तस्वीर देखी जरूर थी, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। शाम तक उसकी मुस्कान गायब हो चुकी थी।
उसे लगने लगा, “क्या मैं अब सुंदर नहीं रही? क्या किसी को मेरी परवाह नहीं? क्या मैं लोगों के लिए कोई मायने नहीं रखती?”
उसने अपनी वही तस्वीर व्हाट्सऐप के कई ग्रुपों में भेज दी। वहाँ भी नीले टिक तो आ गए, मगर जवाब नहीं आया। हर बार मोबाइल की स्क्रीन जलती, उसका दिल उम्मीद से धड़क उठता, लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगती।
रात को वह तकिए में चेहरा छिपाकर रोने लगी।
तभी उसकी माँ उसके पास आईं। उन्होंने प्यार से पूछा, “बेटी, क्या हुआ?”
नित्या फूट-फूटकर रो पड़ी। बोली, “माँ, शायद अब मैं किसी के लिए अच्छी नहीं रही। मेरी फोटो किसी को पसंद ही नहीं आई।”
माँ ने उसके आँसू पोंछे और उसे अपने पास बैठाकर बोलीं—
“बेटी, जब तू छोटी थी, मिट्टी में खेलकर घर आती थी, तब तेरी मुस्कान देखकर हमारा घर खिल उठता था। तब न कोई लाइक था, न कोई कमेंट… फिर भी तू सबसे ज्यादा खुश रहती थी। आज तूने अपनी खुशी उन लोगों के हवाले कर दी है, जिन्हें शायद तेरी पोस्ट देखने की भी फुर्सत नहीं।”
माँ ने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा,
“याद रख, जो लोग तुम्हारी तस्वीर पर लाइक नहीं करते, जरूरी नहीं कि वे तुमसे प्यार भी नहीं करते। कई लोग दिल से दुआ देते हैं, लेकिन शब्दों में नहीं कहते। और कुछ लोग सिर्फ स्क्रॉल करके आगे बढ़ जाते हैं। क्या उनकी चुप्पी से तुम्हारी कीमत कम हो जाती है?”
नित्या की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
उसने पहली बार महसूस किया कि सचमुच उसने अपनी खुशियों का रिमोट कंट्रोल दूसरों के हाथों में दे दिया था।
उसने उसी पल मोबाइल बंद किया, माँ को गले लगा लिया और बोली,
“आज से मेरी मुस्कान किसी लाइक, कमेंट या शेयर की मोहताज नहीं होगी। मैं अपनी खुशी खुद तय करूँगी।”
माँ ने उसके माथे को चूम लिया। उस रात नित्या ने वर्षों बाद सबसे सुकून भरी नींद सोई।
जिस दिन हम अपनी खुशी का रिमोट दूसरों के हाथों से वापस अपने हाथ में ले लेते हैं, उसी दिन से सच्ची जिंदगी शुरू होती है। दुनिया की तालियों से ज्यादा कीमती अपने मन की शांति होती है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
