” ये कैसा अभिमान ? “

बहुत समय पहले की बात है। उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गाँव गंगा गंज में चौधरी हरिसिंह अपनी पत्नी गौरीदेवी के साथ रहते थे। दोनों का विवाह हुए पंद्रह वर्ष बीत चुके थे। घर बड़ा नहीं था, मगर आँगन में तुलसी का चौरा, दीवार पर मिट्टी के दीपक और रसोई में चूल्हे की खुशबू उनके घर को स्वर्ग जैसा बना देती थी।

हरिसिंह स्वभाव से सीधे और शांत पुरुष थे। खेतों में दिनभर मेहनत करते और संध्या होते ही घर लौट आते। गौरीदेवी भी पति की सेवा में कोई कमी नहीं रखती थीं। दोनों के बीच प्रेम बहुत था, बस दोनों में से कोई कभी अपने मन की बात खुलकर नहीं कहता था।

एक दिन छोटी-सी बात पर दोनों में मनमुटाव हो गया।

हरिसिंह खेत से लौटे तो बहुत थके हुए थे। उन्होंने भोजन माँगा। गौरीदेवी किसी काम में व्यस्त थीं। हरिसिंह ने झुंझलाकर कह दिया,
“दिनभर खेत में खटकर आता हूँ, घर आकर भी अपने हाथ से रोटी बनानी पड़ेगी क्या?”

बस, यही बात गौरीदेवी के मन में तीर की तरह लग गई।

उन्होंने उसी दिन से पति से बोलना बंद कर दिया।

हरिसिंह ने पहली रात सोचा, “सुबह तक गुस्सा उतर जाएगा।”

लेकिन सुबह भी गौरीदेवी मौन रहीं।

दूसरे दिन भी।

तीसरे दिन भी।

गाँव की औरतें समझातीं, “गौरी, मर्द है तुम्हारा, दो बोल मीठे बोल दे। घर की बात घर में ही अच्छी लगती है।”

गौरीदेवी कहतीं,
“मैं क्यों बोलूँ? गलती उनकी है। देखती हूँ कब तक मुझे मनाने नहीं आते।”

उधर हरिसिंह भी भीतर से टूट रहे थे। उन्हें उम्मीद थी कि गौरी एक दिन स्वयं बोल उठेंगी। मगर पुरुष का अहंकार भी कम कहाँ होता है?

दिन सप्ताहों में बदल गए।

एक शाम हरिसिंह खेत से लौटते समय रास्ते में गिर पड़े। उम्र और मेहनत ने शरीर को कमजोर कर दिया था। गाँव के वैद्य ने देखकर कहा,
“बहुत थक गए हो चौधरी साहब। आराम जरूरी है।”

घर लौटकर वे चारपाई पर लेट गए।

गौरीदेवी ने सब देखा, पर घमंड के कारण पास जाकर कुछ न कहा। रात गहरी हुई तो उन्होंने देखा कि हरिसिंह को तेज बुखार है।

उनके मन ने कहा—“जाकर माथे पर हाथ रख दे।”

लेकिन अहंकार ने रोक दिया—“पहले वही बात करें।”

आधी रात को अचानक हरिसिंह ने धीमी आवाज में कहा,
“गौरी… पानी मिलेगा?”

गौरीदेवी उठीं, मगर उनके कदम वहीं रुक गए।

कुछ क्षण बाद फिर आवाज आई,
“रहने दो… तुम नाराज़ हो।”

यह सुनते ही गौरीदेवी की आँखों से आँसू बहने लगे।

वह दौड़कर पति के पास बैठ गईं और बोलीं,
“नहीं चौधरी जी… मैं नाराज़ नहीं हूँ। मैं तो बस यह चाहती थी कि आप मुझे मनाएँ।”

हरिसिंह ने कमजोर मुस्कान के साथ कहा,
“पगली… मैं भी यही सोचता रहा कि तुम पहले बोलोगी।”

गौरीदेवी ने उनका हाथ पकड़ लिया।

“हम दोनों जीतना चाहते रहे… और हमारा घर हारता रहा।”

हरिसिंह की आँखें भी भर आईं।

उस रात दोनों ने एक-दूसरे से कोई शिकायत नहीं की। केवल हाथ थामे बैठे रहे।

सुबह गाँव की बूढ़ी जमुना काकी ने यह देखा तो बोलीं—

“बेटा, रिश्तों में जो पहले झुक जाता है, वह छोटा नहीं होता। वही बड़ा होता है। घमंड चाहे औरत का हो या मर्द का, उसकी आग में सबसे पहले अपना ही घर जलता है।”

उस दिन के बाद गौरीदेवी और हरिसिंह ने एक बात गांठ बाँध ली—

रिश्ते में यह मत देखो कि पहले कौन मनाएगा, यह देखो कि कहीं देर होने से अपना कोई हमेशा के लिए रूठ न जाए।

क्योंकि कभी-कभी एक छोटी-सी खामोशी इतनी लंबी हो जाती है कि उसे तोड़ने वाला इंसान ही हमारे पास नहीं रहता।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार      !

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