” छुटकी का बड़ा सपना “

शहर की एक छोटी-सी चाय की दुकान पर रोज़ की तरह ग्राहकों की भीड़ लगी हुई थी। दुकान के कोने में एक आठ-दस साल की दुबली-पतली बच्ची फुर्ती से काम कर रही थी। उसके एक हाथ में चाय के गिलास होते और दूसरे हाथ में अपने छोटे भाई की चिंता।

अचानक दुकान के मालिक ने आवाज़ लगाई, “अरे छुटकी! ज़रा देख तो, तेरा भाई फिर रो रहा है।”

छुटकी तुरंत सब काम छोड़कर भागी और अपने छोटे भाई को गोद में उठा लिया। थोड़ी देर बाद वह उसे चुप कराकर फिर काम में लग गई।

यह सब देखकर एक ग्राहक हैरान था। उसने सेठ से कहा, “भाई साहब, मैं कई दिनों से देख रहा हूँ। यह बच्ची कभी गिलास तोड़ देती है, कभी चाय गिरा देती है, लेकिन आप इसे डाँटते तक नहीं। आखिर बात क्या है?”

सेठ मुस्कुराया और बोला, “इस बच्ची की कहानी सुनोगे तो तुम्हारी आँखें भी नम हो जाएँगी।”

फिर उसने बताना शुरू किया।

“कुछ महीने पहले यह बच्ची अपने छोटे भाई को गोद में लिए मेरी दुकान पर आई थी। उसके कपड़े फटे हुए थे, लेकिन आँखों में आत्मसम्मान और हिम्मत चमक रही थी। उसने मुझसे कहा—’सेठ जी, मुझे काम चाहिए। मैं भीख नहीं माँगना चाहती। मेरे छोटे भाई को भीख माँगना नहीं सिखाना चाहती। मैं मेहनत करूँगी, बस मुझे और मेरे भाई को दो वक्त का खाना मिल जाए। जब मेरा भाई रोएगा, तब मुझे पहले उसे संभालने देना।'”

मैंने पूछा, “और पैसे?”

वह बोली, “अगर काम सीख गई तो जो उचित लगे दे देना। मेरा सपना है कि मेरा भाई पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बने।”

उसकी बातें सुनकर मैं कुछ पल के लिए चुप रह गया। इतनी छोटी उम्र, लेकिन सोच कितनी बड़ी!

सेठ आगे बोला, “उस दिन मैंने समझ लिया कि यह बच्ची गरीब जरूर है, लेकिन इसकी सोच बहुत अमीर है। यह गलती से गिलास तोड़ सकती है, लेकिन कभी किसी का विश्वास नहीं तोड़ेगी।”

इतने में छुटकी फिर दौड़ती हुई आई और बोली, “सेठ जी, भाई फिर रो रहा है।”

सेठ हँसते हुए बोला, “जा बेटा, पहले अपने भाई को संभाल।”

ग्राहक यह सब देख रहा था। उसकी आँखों में सम्मान झलक रहा था। उसने कहा, “सचमुच, यह बच्ची उम्र में छोटी है, लेकिन जिम्मेदारी में बहुत बड़ी है।”

उस दिन ग्राहक ने महसूस किया कि महानता उम्र से नहीं, विचारों और कर्मों से होती है। जिस उम्र में बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, उस उम्र में छुटकी अपने भाई के भविष्य के सपने बुन रही थी।

 

जीवन में परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, आत्मसम्मान, मेहनत और जिम्मेदारी का रास्ता कभी नहीं छोड़ना चाहिए। जो लोग संघर्षों के बीच भी हार नहीं मानते, वही एक दिन अपनी तकदीर बदल देते हैं। और जो लोग ऐसे संघर्षरत लोगों का हाथ थामते हैं, वे वास्तव में मानवता की सबसे बड़ी सेवा करते हैं।

“मदद का सबसे सुंदर रूप किसी को भीख देना नहीं, बल्कि उसे अपने पैरों पर खड़ा होने का अवसर देना है।”

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार    !

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *