” तकरार में छुपा प्यार “

राहुल अपने एक रिश्तेदार के घर दो दिनों के लिए गया था। घर में लगभग पैंसठ वर्ष के दादाजी और साठ वर्ष की दादीजी रहते थे। सुबह से शाम तक दोनों की नोक-झोंक सुनाई देती रहती। कभी दादी कहतीं, “इतनी उम्र हो गई, फिर भी किसी की बात नहीं मानते।” तो कभी दादाजी मुस्कुराते हुए कहते, “तुम्हें तो हर बात में शिकायत ही करनी है।”

राहुल को लगता कि दोनों हर समय लड़ते रहते हैं। एक सुबह वह नीचे आया तो देखा कि दादाजी हाथ में पोछा लेकर पूरे घर की सफाई कर रहे थे। तभी रसोई से दादी की आवाज़ आई, “कितनी बार कहा है, ये काम मत किया करो।”

राहुल ने दादाजी से पूछा, “जब दादी मना करती हैं तो आप सफाई क्यों करते हैं?”

दादाजी मुस्कुराए और बोले, “बेटा, अगर मैं नहीं करूँगा तो तुम्हारी दादी खुद करेंगी। उनकी कमर में दर्द रहता है। इसलिए मैं पहले ही कर देता हूँ, ताकि उन्हें तकलीफ़ न हो।”

कुछ देर बाद राहुल रसोई में गया। दादी सिल-बट्टे पर धनिया और मिर्च पीस रही थीं। उसने कहा, “दादी, मिक्सी तो है, फिर इतनी मेहनत क्यों?”

दादी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “तुम्हारे दादाजी को सिल-बट्टे की चटनी बहुत पसंद है। उनके चेहरे की खुशी देखने के लिए इतनी मेहनत क्या बड़ी बात है?”

नाश्ते के समय भी दोनों की नोक-झोंक जारी रही। दादाजी बोले, “मैं बाज़ार से सब्ज़ी ले आता हूँ।”

दादी तुरंत बोलीं, “आपसे दो कदम चला नहीं जाता, फिर थैला उठाकर लाएँगे!”

राहुल को लगा कि दादी उन्हें रोक रही हैं। लेकिन बाद में दादी ने धीरे से कहा, “इनके घुटनों में दर्द रहता है। कहीं रास्ते में तकलीफ़ हो गई तो?”

अगले दिन राहुल ने देखा कि दादाजी सुबह अकेले टहलने निकल गए। दादी नाराज़ थीं कि उन्हें साथ नहीं ले गए। जब राहुल ने दादाजी से पूछा तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “रातभर इन्हें नींद नहीं आती। सुबह ज़रा आँख लगती है। मैं कैसे जगाऊँ?”

शाम को दादी ने दादाजी के स्कूटर की चाबी छिपा दी। दादाजी बोले, “मेरी चाबी कहाँ रख दी?”

दादी ने कहा, “अब इस उम्र में स्कूटर चलाकर गिर गए तो मेरी जान निकल जाएगी।”

राहुल यह सब देखकर भावुक हो गया। उसे समझ आ गया कि ये झगड़े असल में झगड़े नहीं थे, बल्कि एक-दूसरे की चिंता जताने का अनोखा तरीका थे। जहाँ शब्दों में तकरार थी, वहीं दिलों में अथाह प्रेम था।

घर लौटते समय राहुल ने मन ही मन सोचा—रिश्ते मीठी बातों से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी परवाहों से मजबूत बनते हैं। सच्चा जीवनसाथी वही होता है जो हर उम्र में आपका हाथ थामे रखे, चाहे प्यार जताने का तरीका थोड़ा अलग ही क्यों न हो।

सच्चा प्रेम दिखावे में नहीं, बल्कि एक-दूसरे की चिंता, त्याग और जीवनभर निभाए गए साथ में छिपा होता है।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार        !

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *