एक दिन पंजाब के महान और न्यायप्रिय राजा महाराज रणजीत सिंह अपने सैनिकों के साथ राज्य का भ्रमण कर रहे थे। उनका उद्देश्य था कि वे स्वयं अपनी प्रजा का हाल जानें और उनकी समस्याओं को समझें। घोड़े पर सवार महाराज शांत मन से आगे बढ़ रहे थे कि तभी अचानक एक पत्थर आकर उनके कंधे से टकराया। सैनिक तुरंत सतर्क हो गए। उन्हें लगा कि किसी ने महाराज पर हमला किया है।
सेनापति ने आदेश दिया, “जिसने भी यह दुस्साहस किया है, उसे तुरंत पकड़कर लाओ!”
कुछ ही देर में सैनिक एक कमजोर और वृद्ध महिला को पकड़कर महाराज के सामने ले आए। वह डर के मारे काँप रही थी। उसके चेहरे पर गरीबी और भूख की गहरी रेखाएँ साफ दिखाई दे रही थीं।
महाराज ने बड़े शांत स्वर में पूछा, “माता, क्या पत्थर तुमने फेंका था?”
वृद्धा ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, “हाँ महाराज, पत्थर मैंने ही फेंका था। लेकिन मेरा आपको चोट पहुँचाने का कोई इरादा नहीं था।”
महाराज ने पूछा, “फिर पत्थर क्यों फेंका?”
वृद्धा की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने भर्राए हुए स्वर में कहा, “महाराज, मेरे तीन छोटे-छोटे बच्चे हैं। दो दिनों से उनके पेट में अन्न का एक दाना भी नहीं गया। वे भूख से बिलख रहे हैं। मैं जंगल में भोजन की तलाश में निकली थी। तभी मैंने एक पेड़ देखा जो मीठे फलों से लदा हुआ था। फल तोड़ने का कोई उपाय नहीं था, इसलिए मैंने पत्थर मारकर फल गिराने की कोशिश की। लेकिन दुर्भाग्य से वह पत्थर आपको लग गया। मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मुझे क्षमा कर दीजिए।”
वृद्धा की करुण कहानी सुनकर वहाँ उपस्थित सभी सैनिकों का सिर झुक गया। कुछ क्षणों तक महाराज मौन रहे। फिर उन्होंने मुस्कुराते हुए अपने खजांची को बुलाया और आदेश दिया, “इन माता को पर्याप्त अशर्फियाँ, अनाज और वस्त्र दिए जाएँ ताकि इनके बच्चों को फिर कभी भूखा न सोना पड़े।”
यह सुनकर सेनापति आश्चर्यचकित रह गया। उसने विनम्रता से पूछा, “महाराज, जिसने आप पर पत्थर फेंका, उसे दंड देने के बजाय पुरस्कार क्यों दिया जा रहा है?”
महाराज रणजीत सिंह मुस्कुराए और बोले, “सेनापति, जब एक पेड़ पत्थर खाने के बाद भी मीठे फल देता है, तो हम मनुष्य होकर दया और उदारता क्यों न दिखाएँ? यदि हम शक्ति का उपयोग केवल दंड देने में करेंगे, तो लोग हमसे डरेंगे; लेकिन यदि शक्ति का उपयोग करुणा के लिए करेंगे, तो लोग हमें अपने हृदय में स्थान देंगे।”
महाराज की बात सुनकर सभी सैनिकों की आँखें श्रद्धा से भर उठीं। वृद्धा बार-बार उन्हें आशीर्वाद देती हुई अपने घर लौट गई। उस दिन पूरे राज्य में महाराज की दयालुता और न्यायप्रियता की चर्चा होने लगी।
सच्चा महान वही होता है जो बदले की भावना नहीं, बल्कि दया, क्षमा और करुणा का मार्ग अपनाता है। दूसरों की मजबूरी को समझना ही सच्ची इंसानियत है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
