महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था। एक दिन भगवान श्रीकृष्ण के साथ अर्जुन और भीम हस्तिनापुर से एक आश्रम की ओर जा रहे थे। रास्ता लंबा था, इसलिए वे एक साधारण बैलगाड़ी में अन्य यात्रियों के साथ बैठ गए।
कुछ दूर चलने के बाद एक क्रोधी स्वभाव का यात्री भी बैलगाड़ी में चढ़ा। उसके पास भारी सामान था। उसने बिना सोचे-समझे अपना सामान इस तरह रखा कि उसका बोझ अर्जुन के पैरों और कंधे पर आ गया। इतना ही नहीं, वह बार-बार अर्जुन को धक्का भी देता रहा।
भीम का स्वभाव तेज़ था। उनका क्रोध बढ़ने लगा। वे बोले, “पार्थ! यह व्यक्ति तुम्हारा अपमान कर रहा है। बस एक आदेश दो, अभी इसे इसकी मर्यादा याद दिला दूँ।”
अर्जुन मुस्कुराए और शांत स्वर में बोले, “भैया भीम, धैर्य रखिए।”
भीम ने आश्चर्य से पूछा, “अपमान सहना भी कोई वीरता है?”
अर्जुन बोले, “हम कुछ ही देर में अपने गंतव्य पर उतर जाएंगे। यह यात्री अपने मार्ग चला जाएगा और हम अपने। इस छोटे से सफ़र के लिए यदि मैं क्रोध करूँ, विवाद करूँ या किसी का अपमान करूँ, तो नुकसान मेरा ही होगा।”
भगवान श्रीकृष्ण यह सब सुनकर मुस्कुराए और बोले, “पार्थ ने आज जीवन का सबसे बड़ा रहस्य समझ लिया है। यह संसार भी एक यात्रा है। यहाँ मिलने वाले सभी लोग कुछ समय के सहयात्री हैं। कोई सम्मान देता है, कोई अपमान; कोई सुख देता है, कोई दुःख। यदि हर छोटी बात पर क्रोध करेंगे, तो अपना ही मन अशांत करेंगे।”
श्रीकृष्ण आगे बोले, “मनुष्य का जीवन दुर्लभ है और क्षणभंगुर भी। कौन कब इस संसार की यात्रा पूरी कर ले, कोई नहीं जानता। इसलिए क्षमा, धैर्य और प्रेम के साथ जीवन जीना ही सच्ची बुद्धिमानी है।”
भीम ने विनम्र होकर कहा, “आज समझ में आया कि सबसे बड़ा बल केवल बाहुबल नहीं, बल्कि अपने क्रोध पर विजय पाना है।”
उस दिन से भीम ने निश्चय किया कि जहाँ तक संभव हो, छोटी-छोटी बातों पर क्रोधित होने के बजाय धैर्य और विवेक से काम लेंगे।
जीवन एक छोटा सफ़र है। इसमें हर व्यक्ति कुछ समय का सहयात्री है। इसलिए छोटी-छोटी बातों पर विवाद करने के बजाय धैर्य, क्षमा और प्रेम से व्यवहार करें। यही सच्ची वीरता और जीवन की सबसे बड़ी जीत है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
