” धन की दौड़ का अंत “

“आदमी धन के पीछे तब तक भागता है, जब तक कि उसका निधन नहीं हो जाता।”

एक छोटे से शहर में रमेश नाम का एक व्यापारी रहता था। वह बहुत मेहनती था, लेकिन उसकी एक ही कमजोरी थी—उसे धन कमाने की ऐसी लालसा थी कि उसे अपने परिवार, रिश्तेदारों और स्वास्थ्य की बिल्कुल परवाह नहीं थी।

उसकी पत्नी अक्सर कहती, “इतना पैसा कमाकर क्या करोगे? बच्चों के साथ भी समय बिताओ।”

रमेश मुस्कुराकर जवाब देता, “अभी मेहनत कर लेने दो। जब बहुत पैसा हो जाएगा, तब आराम से जी लेंगे।”

लेकिन वह “एक दिन” कभी नहीं आया।

धीरे-धीरे उसका व्यापार बढ़ता गया। उसने कई दुकानें, मकान और जमीनें खरीद लीं। बैंक बैलेंस करोड़ों में पहुँच गया। लोग उसकी अमीरी की मिसाल देने लगे। मगर उसी दौरान उसके बच्चे उससे दूर हो गए। पत्नी की मुस्कान भी कहीं खो गई। बूढ़े माता-पिता उसे देखने को तरसते रहे, लेकिन रमेश के पास हमेशा एक ही जवाब होता—”अभी बहुत काम है।”

समय बीतता गया। एक दिन लगातार काम और तनाव की वजह से रमेश की तबीयत अचानक बिगड़ गई। डॉक्टर ने साफ कहा, “अब आपको आराम की ज़रूरत है। परिवार के साथ समय बिताइए, नहीं तो पछताना पड़ेगा।”

लेकिन रमेश ने डॉक्टर की बात भी अनसुनी कर दी। उसे लगा कि अभी बहुत पैसा कमाना बाकी है।

कुछ महीनों बाद एक सुबह वह अपने ऑफिस में ही बेहोश होकर गिर पड़ा। अस्पताल पहुँचने से पहले ही उसकी मृत्यु हो गई।

जब उसकी वसीयत पढ़ी गई तो उसमें करोड़ों की संपत्ति थी, लेकिन उसके अंतिम समय में उसके पास बैठने वाला कोई अपना नहीं था। उसके बच्चे विदेश में थे, रिश्तेदार केवल संपत्ति की चर्चा कर रहे थे, और उसकी पत्नी की आँखों में सिर्फ एक सवाल था—”क्या यही दौलत तुम्हें चाहिए थी?”

रमेश सब कुछ कमाकर भी जीवन की सबसे कीमती दौलत—अपने रिश्ते, अपनापन और सुकून—हार चुका था।

उस दिन शहर के एक बुज़ुर्ग ने लोगों से कहा, “धन कमाना गलत नहीं है, लेकिन धन कमाने की ऐसी दौड़, जो इंसान को अपनों से दूर कर दे, वह जीवन की सबसे बड़ी हार है।”

धन जीवन जीने का साधन है, जीवन का उद्देश्य नहीं। पैसा कमाइए, लेकिन अपने परिवार, स्वास्थ्य और रिश्तों के लिए भी समय निकालिए। क्योंकि अंत में साथ बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि आपके अच्छे कर्म और अपने लोगों का प्यार जाता है।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार      !

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