एक घने जंगल के किनारे दो साधु रहते थे। उनमें से एक वृद्ध था, जिसका नाम स्वामी शांतानंद था, और दूसरा उसका युवा शिष्य अर्जुन। दोनों वर्षभर गांव-गांव घूमकर लोगों को प्रेम, सेवा और ईश्वर भक्ति का संदेश देते थे। वर्षा ऋतु आने पर वे अपनी छोटी-सी कुटिया में लौट आते थे।
एक वर्ष जब वे कई महीनों बाद अपनी कुटिया के पास पहुंचे, तो देखा कि तेज तूफान ने उसका आधा छप्पर उड़ा दिया था। कुटिया की हालत देखकर अर्जुन का चेहरा उतर गया।
वह क्रोध में बोला, “गुरुदेव! यह कैसा न्याय है? हम जीवनभर ईश्वर का नाम लेते हैं, लोगों की सेवा करते हैं, फिर भी हमारी यह दशा है। जिन लोगों ने कभी पूजा नहीं की, उनके बड़े-बड़े मकान सुरक्षित हैं, और हमारी कुटिया टूट गई। क्या भक्ति का यही फल मिलता है?”
अर्जुन की बातें सुनकर स्वामी शांतानंद मुस्कुराए। उन्होंने आकाश की ओर देखा, हाथ जोड़कर कहा, “प्रभु, आपका धन्यवाद! आपने आधा छप्पर बचा लिया। यदि आपकी कृपा न होती, तो पूरी कुटिया ही नष्ट हो जाती।”
अर्जुन को यह बात समझ नहीं आई। उसे लगा कि गुरुदेव परिस्थिति की गंभीरता को समझ ही नहीं रहे हैं।
रात हुई। बादल छाए हुए थे। अर्जुन चिंता में डूबा रहा। उसे डर था कि यदि बारिश आ गई तो क्या होगा? वह बार-बार करवटें बदलता रहा। मन में शिकायतें, भय और असंतोष भरे हुए थे।
लेकिन स्वामी शांतानंद गहरी नींद में सो गए।
रात के अंतिम पहर उनकी आंख खुली। उन्होंने देखा कि टूटे हुए छप्पर की जगह से चमकता हुआ चांद दिखाई दे रहा है। ठंडी हवा भीतर आ रही थी और पूरा वातावरण अद्भुत शांति से भरा हुआ था।
वे आनंद से भर उठे। उन्होंने अपनी डायरी निकाली और लिखने लगे—
“हे प्रभु! आज तक हम इस छप्पर को अपना रक्षक समझते रहे, पर यह तो आपके सुंदर आकाश को हमसे छिपाए हुए था। यदि हमें पता होता कि टूटे हुए छप्पर से इतनी सुंदर चांदनी भीतर आएगी, तो हम स्वयं ही इसे हटा देते। आपने जो लिया, उससे कहीं अधिक सुंदर हमें दे दिया।”
सुबह अर्जुन ने वह लेख पढ़ा। वह कुछ देर तक मौन रहा। पहली बार उसे समझ आया कि दुख और सुख अक्सर परिस्थितियों में नहीं, बल्कि हमारे दृष्टिकोण में छिपे होते हैं।
जिस घटना को वह दुर्भाग्य समझ रहा था, उसी में उसके गुरु ने ईश्वर की कृपा देख ली थी। एक ही कुटिया, एक ही रात, एक ही परिस्थिति—फिर भी एक व्यक्ति दुखी था और दूसरा आनंदित।
उस दिन अर्जुन ने जीवन का सबसे बड़ा पाठ सीखा। उसने जाना कि जो व्यक्ति हर परिस्थिति में अवसर खोज लेता है, वह कभी पराजित नहीं होता। जीवन में समस्याएँ तो आएँगी, कुछ छप्पर टूटेंगे भी, लेकिन यदि दृष्टि सकारात्मक हो, तो हर टूटन के पीछे एक नया आकाश दिखाई देता है।
जीवन की खुशियाँ परिस्थितियों पर नहीं, हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर करती हैं। जो व्यक्ति शिकायत की जगह कृतज्ञता चुनता है, उसे हर कठिनाई में भी ईश्वर की कृपा दिखाई देती है। कभी-कभी जो खो जाता है, वही हमें कुछ बड़ा और सुंदर पाने का रास्ता दिखाता है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
