बहुत समय पहले आर्यावर्त में राजा विक्रमसेन नाम के एक न्यायप्रिय और दयालु राजा का शासन था। उनकी कीर्ति दूर-दूर तक फैली हुई थी। प्रजा उन्हें केवल राजा ही नहीं, बल्कि अपना संरक्षक और पिता समान मानती थी। उनके महल के द्वार हर जरूरतमंद के लिए हमेशा खुले रहते थे। जो भी सहायता मांगने आता, राजा उसे निराश नहीं लौटाते। उनका विश्वास था कि प्रेम और विश्वास से सबसे कठोर हृदय भी बदला जा सकता है।
उसी समय पड़ोसी राज्य की जेल से एक कुख्यात चोर कालकेतु भाग निकला। उसके पीछे सैनिकों की टुकड़ियाँ लगी हुई थीं। जंगलों और पहाड़ों से भागते-भागते वह राजा विक्रमसेन के राज्य में पहुँच गया। रात गहरा चुकी थी। थका-हारा कालकेतु महल के पीछे बने अतिथि भवन में जा पहुँचा।
संयोग से उसी समय राजा विक्रमसेन साधारण वेश में राज्य का निरीक्षण कर रहे थे। उन्होंने उस अजनबी को देखा और मुस्कुराकर बोले, “आओ अतिथि, तुम बहुत थके हुए लगते हो। पहले विश्राम करो, फिर अपनी बात कहना।”
कालकेतु ने झूठ बोलते हुए कहा, “महाराज, मैं एक व्यापारी हूँ। रास्ता भटक गया हूँ। यदि आज रात आश्रय मिल जाए तो आपका बड़ा उपकार होगा।”
राजा ने बिना कोई प्रश्न किए उसके लिए स्नान, भोजन और विश्राम की व्यवस्था कर दी। उन्होंने स्वयं अपने सेवकों से कहा, “अतिथि देवो भवः, इसकी सेवा में कोई कमी न रहे।”
इतना सम्मान और प्रेम पाकर भी कालकेतु का लालच नहीं गया। आधी रात को उसने महल के खजाने से सोने का एक बहुमूल्य मुकुट और कुछ स्वर्ण आभूषण चुरा लिए और चुपके से भाग निकला।
लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंजूर था। सुबह होते ही सीमा पर तैनात सैनिकों ने उसे पकड़ लिया। उसके पास से राजा का मुकुट और आभूषण बरामद हुए। सैनिक उसे दरबार में ले आए।
मुख्य सेनापति ने कहा, “महाराज! यही वह चोर है जिसने आपके महल से स्वर्ण चुराया है।”
सभी दरबारी क्रोधित थे। उन्हें लगा कि अब चोर को कठोर दंड मिलेगा।
लेकिन राजा विक्रमसेन शांत स्वर में बोले, “नहीं, इस व्यक्ति ने चोरी नहीं की। मैंने ही यह स्वर्ण इसे दान में दिया था। यह मेरा अतिथि था, और अतिथि को सम्मान देना मेरा धर्म है।”
राजा के ये शब्द सुनकर कालकेतु स्तब्ध रह गया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। वह राजा के चरणों में गिर पड़ा और बोला, “महाराज! मैं जन्म से चोर नहीं था, परिस्थितियों ने मुझे अपराधी बना दिया। लेकिन आज पहली बार किसी ने मुझ पर विश्वास किया है। आपने मेरे अपराध को क्षमा करके मुझे नया जीवन दे दिया। आज से मैं कभी चोरी नहीं करूँगा और ईमानदारी का मार्ग अपनाऊँगा।”
राजा ने उसे उठाकर गले लगा लिया और बोले, “मनुष्य से गलती हो सकती है, लेकिन जो अपनी गलती स्वीकार कर ले, वही सच्चा वीर होता है। विश्वास सबसे बड़ी शक्ति है। यह पत्थर जैसे कठोर हृदय को भी मोम बना देता है।”
उस दिन के बाद कालकेतु ने अपराध का मार्ग छोड़ दिया। वह राजा का सच्चा सेवक बन गया और जीवनभर गरीबों की सेवा करता रहा। उसकी ईमानदारी की चर्चा पूरे राज्य में होने लगी! विश्वास, दया और क्षमा में वह शक्ति होती है जो सबसे बड़े अपराधी का भी हृदय बदल सकती है। जब हम किसी पर विश्वास करते हैं, तो उसके भीतर छिपी अच्छाई जाग उठती है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
