एक बार की बात है। महान संत गोस्वामी तुलसीदास जी प्रभु श्रीराम का भजन करते हुए एक नगर के व्यस्त बाज़ार से होकर गुजर रहे थे। उनके मुख पर “श्रीराम… श्रीराम…” का मधुर जाप था और मन पूरी तरह प्रभु की भक्ति में लीन था।
बाज़ार में चारों ओर चहल-पहल थी। कहीं मिठाइयों की दुकानें सजी थीं, तो कहीं कपड़ों और गहनों की। तभी तुलसीदास जी की दृष्टि कुछ महिलाओं पर पड़ी। वे एक चूड़ी की दुकान पर खड़ी थीं।
उनमें से एक महिला ने अभी-अभी रंग-बिरंगी काँच की सुंदर चूड़ियाँ खरीदी थीं। वह बहुत प्रसन्न थी। बार-बार अपनी सहेलियों को हाथ दिखाकर कहती, “देखो, मेरी चूड़ियाँ कितनी सुंदर हैं! इनकी चमक देखो। पूरे बाज़ार में ऐसी चूड़ियाँ किसी के पास नहीं होंगी। बड़ी मुश्किल से मिली हैं और इतने रुपये देकर खरीदी हैं।”
उसकी सारी बातें केवल चूड़ियों की प्रशंसा में ही थीं। वह अपनी नई वस्तु पर इतना गर्व कर रही थी कि उसे किसी और बात का ध्यान ही नहीं था।
तुलसीदास जी कुछ क्षण रुके, मुस्कुराए और बड़ी विनम्रता से बोले—
“चूड़ी दीनी सेठ ने, तो शोभा बारंबार।
कलाई दीनी करतार ने, उनको दिया बिसार।।”
महिलाएँ यह सुनकर चौंक गईं। वे संत के चरणों में झुक गईं और विनम्रता से बोलीं, “महाराज! कृपया इस दोहे का अर्थ समझाइए।”
तुलसीदास जी बोले, “बेटी! चूड़ियाँ तो दुकानदार ने बेची हैं, इसलिए तुम उनकी इतनी प्रशंसा कर रही हो। लेकिन कभी उस परमात्मा का भी धन्यवाद किया, जिसने तुम्हें यह सुंदर कलाई दी? यदि कलाई ही न होती, तो चूड़ियाँ कहाँ पहनती? यदि हाथ ही न होते, तो इनका सौंदर्य किस काम आता?”
महिलाओं की आँखें नम हो गईं। उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान का स्मरण किया और प्रण लिया कि अब वे केवल वस्तुओं पर ही नहीं, बल्कि उन्हें देने वाले ईश्वर का भी सदैव आभार मानेंगी।
तुलसीदास जी आगे बढ़ गए, लेकिन उनके ये शब्द वहाँ उपस्थित सभी लोगों के हृदय में बस गए।
हम जीवन में घर, धन, कपड़े, गहने, वाहन और अन्य सुख-सुविधाओं के लिए तो प्रसन्न होते हैं, लेकिन उस परमात्मा का धन्यवाद करना भूल जाते हैं जिसने हमें यह अनमोल जीवन, स्वस्थ शरीर, परिवार और सब कुछ दिया है। वस्तुओं से अधिक मूल्यवान उन्हें देने वाला ईश्वर है। इसलिए प्रतिदिन प्रभु का स्मरण करें और कृतज्ञता का भाव रखें। यही सच्चा सुख और सच्ची भक्ति है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
