” सहयोग की शक्ति “

सतयुग में हिमालय की तलहटी में महर्षि अत्रि का एक विशाल आश्रम था। वहाँ अनेक शिष्य वेदों का अध्ययन करते थे और सेवा-भाव से आश्रम के कार्य करते थे।

एक दिन आश्रम में एक बहुत बड़ा यज्ञ आयोजित होना था। यज्ञ के लिए एक विशाल शिला लाकर वेदी बनानी थी। आश्रम का सबसे बलवान शिष्य सत्यकेतु अपने बल पर बहुत गर्व करता था। उसने कहा, “गुरुदेव! इस शिला को मैं अकेला ही उठा लूँगा। मुझे किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं है।”

सत्यकेतु ने पूरी ताकत लगाई। उसने शिला को धक्का दिया, रस्सी से खींचा, लेकिन शिला अपनी जगह से ज़रा भी नहीं हिली। बार-बार प्रयास करने से वह थक गया, परंतु किसी से सहायता माँगने को तैयार नहीं था।

उसी समय आश्रम में एक वृद्ध तपस्वी आए। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “वत्स, यदि अनुमति हो तो मैं एक उपाय बताऊँ?”

सत्यकेतु ने अहंकार से कहा, “मैं वर्षों से कठिन तप और अभ्यास कर रहा हूँ। मुझे किसी की सलाह की आवश्यकता नहीं है।”

तपस्वी शांत स्वर में बोले, “ज्ञान केवल आयु या बल से नहीं, विनम्रता से प्राप्त होता है। एक बार मेरा तरीका भी आज़मा लो।”

गुरुदेव ने भी सत्यकेतु को संकेत किया कि वह तपस्वी की बात सुन ले।

तपस्वी ने सभी शिष्यों को बुलाया और कहा, “तुम सब इस शिला को अलग-अलग दिशाओं से संभालो। कोई रस्सी पकड़े, कोई नीचे लकड़ी लगाए और कोई धक्का दे।”

सभी शिष्यों ने मिलकर एक साथ प्रयास किया। देखते ही देखते वह भारी शिला आसानी से उठ गई और यज्ञ-वेदी के स्थान पर पहुँच गई।

सत्यकेतु आश्चर्यचकित रह गया। उसने तपस्वी के चरणों में झुककर कहा, “आज मुझे समझ आया कि अकेले का बल सीमित होता है, लेकिन सहयोग का बल असीमित होता है।”

तपस्वी मुस्कुराए और बोले, “वत्स, प्रकृति भी हमें यही शिक्षा देती है। अनेक तिनके मिलकर पक्षी का घोंसला बनाते हैं, अनेक बूँदें मिलकर सागर बनाती हैं और अनेक लोग मिलकर असंभव कार्य भी संभव कर देते हैं।”

महर्षि अत्रि ने सभी शिष्यों से कहा, “याद रखो, जो दूसरों की सहायता स्वीकार करना और समय आने पर दूसरों की सहायता करना सीख लेता है, वही सच्चा ज्ञानी कहलाता है।”

उस दिन से सत्यकेतु ने कभी अपने बल का अभिमान नहीं किया। वह हर कार्य अपने साथियों के साथ मिलकर करने लगा और आगे चलकर वही आश्रम का सबसे प्रिय और श्रेष्ठ शिष्य बना।

सहयोग में अपार शक्ति होती है। जो व्यक्ति अहंकार छोड़कर दूसरों का हाथ थामना और दूसरों का हाथ पकड़ना सीख जाता है, उसके लिए कोई भी कार्य कठिन नहीं रहता। सतयुग हो या कलियुग, मिल-जुलकर किया गया कार्य ही सबसे बड़ी सफलता का आधार होता है !

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार      !

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