त्रेतायुग की बात है। लंका की ओर जाने से पहले वानर सेना समुद्र के किनारे खड़ी थी। सामने विशाल समुद्र था। उसकी ऊँची-ऊँची लहरें देखकर बड़े-बड़े योद्धाओं के मन में भी भय उत्पन्न हो रहा था।
सभी सोच रहे थे कि इतनी विशाल जलराशि को पार करके लंका तक पहुँचना कैसे संभव होगा?
तभी जामवंत जी ने हनुमान जी को उनकी शक्ति का स्मरण कराया। हनुमान जी के भीतर आत्मविश्वास जाग उठा। उन्होंने समझ लिया कि समस्या समुद्र की गहराई नहीं, बल्कि मन के भीतर बैठा हुआ भय है।
जामवंत जी ने कहा, “जिसे अपनी शक्ति का ज्ञान नहीं होता, वह छोटी बाधा को भी पर्वत समझ लेता है। और जिसे अपने सामर्थ्य पर विश्वास हो, वह पर्वत जैसी बाधा को भी मार्ग बना लेता है।”
हनुमान जी ने समुद्र की ओर देखा और मन ही मन श्रीराम का स्मरण किया।
उन्होंने कहा, “यदि मेरा उद्देश्य प्रभु श्रीराम का कार्य पूरा करना है, तो यह समुद्र मेरे मार्ग की बाधा नहीं, मेरी परीक्षा है।”
फिर उन्होंने अपना विशाल स्वरूप धारण किया और एक ही छलाँग में समुद्र पार करने के लिए निकल पड़े।
रास्ते में अनेक बाधाएँ आईं। कहीं समुद्र की लहरें उन्हें रोकना चाहती थीं, तो कहीं मैनाक पर्वत ने विश्राम का आग्रह किया। सुरसा ने उनकी परीक्षा ली और लंकिनी ने उनका मार्ग रोकने का प्रयास किया। लेकिन हनुमान जी ने किसी बाधा के सामने अपना धैर्य नहीं खोया।
जहाँ शक्ति की आवश्यकता थी, वहाँ शक्ति का प्रयोग किया। जहाँ बुद्धि की आवश्यकता थी, वहाँ बुद्धि का प्रयोग किया और जहाँ विनम्रता आवश्यक थी, वहाँ विनम्रता दिखाई।
अंततः वे लंका पहुँच गए।
उनकी यह यात्रा हमें सिखाती है कि जीवन में कठिनाइयाँ समुद्र की तरह विशाल दिखाई दे सकती हैं, लेकिन मनुष्य का साहस उनसे कहीं अधिक शक्तिशाली हो सकता है।
कई बार नवनीत हम पहली असफलता के बाद स्वयं को कमजोर समझने लगते हैं। एक परीक्षा में असफल हुए तो पढ़ाई छोड़ देते हैं, व्यापार में नुकसान हुआ तो प्रयास छोड़ देते हैं, किसी रिश्ते में ठोकर लगी तो जीवन से ही निराश हो जाते हैं।
लेकिन हमें हनुमान जी से सीखना चाहिए कि सामर्थ्य हमारे भीतर पहले से मौजूद होता है, आवश्यकता केवल उसे पहचानने की होती है।
जिस दिन मनुष्य अपने भीतर के भय पर विजय प्राप्त कर लेता है,नवनीत उसी दिन उसके सामने खड़ी सबसे बड़ी बाधा भी छोटी लगने लगती है।
समुद्र कितना गहरा है, यह मत देखो; यह देखो कि तुम्हारे भीतर उसे पार करने का साहस कितना है।
जीवन में कठिन परिस्थितियाँ आएँगी, लोग रोकेंगे, रास्ते बंद होंगे और कई बार लगेगा कि अब आगे बढ़ना संभव नहीं है। लेकिन यदि उद्देश्य सच्चा हो, विश्वास अटूट हो और प्रयास निरंतर हो, तो कोई भी बाधा हमेशा के लिए रास्ता नहीं रोक सकती।
हार मत मानिए… क्योंकि कई बार मंजिल से पहले आने वाला सबसे बड़ा तूफान ही आपकी सबसे बड़ी परीक्षा होता है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
