बहुत समय पहले की बात है। सुंदरपुर नाम का एक छोटा-सा गाँव था। वहाँ दीपावली का त्योहार बड़े उत्साह से मनाया जाता था। गाँव के प्रत्येक घर में सफाई होती, रंगोली सजाई जाती और शाम होते ही हजारों दीपक जगमगा उठते थे।
उसी गाँव में माधव नाम का एक गरीब कुम्हार रहता था। वह मिट्टी के दीपक बनाकर अपना परिवार चलाता था। उसके बनाए दीपक पूरे गाँव में प्रसिद्ध थे, लेकिन इस वर्ष उसकी बिक्री बहुत कम हुई थी। बाजार में बिजली से चलने वाली रंग-बिरंगी झालरों और आकर्षक सजावटी सामानों की भरमार थी।
दीपावली से एक दिन पहले माधव का छोटा बेटा चंदन उससे बोला, “पिताजी! इस बार हमारे घर में कितने दीपक जलेंगे?”
माधव ने मुस्कुराने का प्रयास करते हुए कहा, “बेटा, जितने दीपक हमारे पास बचेंगे, उतने ही जला लेंगे।”
चंदन ने मासूमियत से पूछा, “लेकिन पिताजी, हम दूसरों के घरों में इतने सारे दीपक बेचते हैं, फिर हमारा घर अँधेरा क्यों रहता है?”
यह सुनकर माधव कुछ क्षण मौन रहा।
अगली सुबह चंदन अपने पिता के साथ बाजार गया। रास्ते में उसने देखा कि गाँव के बाहर रहने वाली एक वृद्ध महिला, जिसका नाम गौरी था, अपनी टूटी हुई झोपड़ी के बाहर उदास बैठी थी। उसके घर में न सफाई हुई थी और न ही दीपावली की कोई तैयारी।
चंदन ने पूछा, “दादी! आप दीपावली की तैयारी क्यों नहीं कर रही हैं?”
गौरी की आँखें भर आईं। उसने कहा, “बेटा, मेरा इकलौता पुत्र शहर गया था। अब कई वर्षों से उसका कोई समाचार नहीं आया। घर में अकेली हूँ। किसके लिए दीप जलाऊँ?”
चंदन ने अपने पिता की ओर देखा और बोला, “पिताजी, क्या हम दादी को कुछ दीपक दे सकते हैं?”
माधव ने बिना कुछ सोचे अपने झोले में से पाँच सुंदर दीपक निकाले और गौरी को दे दिए।
चंदन ने फिर कहा, “पिताजी, केवल दीपक देने से क्या होगा? दादी का घर भी तो साफ करना चाहिए।”
दोनों ने मिलकर गौरी की झोपड़ी साफ की, आँगन में रंगोली बनाई और शाम को पाँचों दीपक जला दिए।
गौरी की आँखों में कई वर्षों बाद खुशी चमक उठी। उसने चंदन के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया।
यह देखकर माधव के मन में एक नया विचार आया।
वह गाँव के अन्य लोगों के पास गया और बोला, “इस दीपावली हम सभी मिलकर ऐसे परिवारों के घर रोशन करें, जिनके पास त्योहार मनाने के साधन नहीं हैं।”
धीरे-धीरे गाँव के अनेक लोग उसके साथ जुड़ गए। किसी ने मिठाई दी, किसी ने नए कपड़े और किसी ने तेल तथा दीपक दिए।
शाम होते-होते गाँव के उन सभी घरों में दीप जल उठे, जहाँ वर्षों से दीपावली केवल एक सामान्य दिन बनकर रह गई थी।
सबसे सुंदर दृश्य तब दिखाई दिया, जब गाँव के बड़े-बड़े व्यापारी भी गरीब परिवारों के साथ बैठकर भोजन करने लगे।
कुछ दिनों बाद गौरी के घर एक पत्र आया। उसका पुत्र गाँव लौटने वाला था। पत्र पढ़कर वह खुशी से रो पड़ी।
उसने माधव और चंदन से कहा, “तुम दोनों ने मुझे केवल दीपावली की खुशी नहीं दी, बल्कि जीने की एक नई आशा भी दी है।”
उस दिन माधव को समझ आया कि दीपक मिट्टी का हो या सोने का, उसका असली मूल्य उसकी कीमत से नहीं, बल्कि उसके प्रकाश से होता है।
दीपावली का वास्तविक अर्थ केवल अपने घर को रोशन करना नहीं, बल्कि किसी दूसरे के जीवन में भी खुशियों का प्रकाश फैलाना है। धन से खरीदी गई खुशियाँ कुछ समय के लिए होती हैं, लेकिन निस्वार्थ सेवा और प्रेम से मिली मुस्कान जीवनभर याद रहती है।
इस दीपावली एक संकल्प अवश्य लें—एक दीप अपने घर में जलाएँ और एक दीप किसी ऐसे व्यक्ति के जीवन में जलाएँ, जिसे आपकी सहायता और प्रेम की आवश्यकता है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
