बहुत समय पहले की बात है। हिमालय की तलहटी में देवपुर नाम का एक सुंदर राज्य था। वहाँ के राजा धर्मकेतु न्यायप्रिय और प्रजा के हितैषी थे। उनके राजमहल में सत्यदास नाम का एक सेवक रहता था। वह अत्यंत ईमानदार, परिश्रमी और भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था।
सत्यदास का विश्वास था कि मनुष्य को अपना कर्म पूरी निष्ठा से करना चाहिए और परिणाम भगवान पर छोड़ देना चाहिए। वह अक्सर कहता था—
“जिसने जीवन दिया है, वही जीवन की आवश्यकताओं का प्रबंध भी करता है।”
एक दिन सत्यदास अचानक राजमहल की सेवा में नहीं पहुँचा। राजा ने कारण पूछा तो पता चला कि उसके घर पुत्र का जन्म हुआ है। राजा अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, “सत्यदास ने वर्षों से ईमानदारी से सेवा की है। आज उसके घर भगवान ने पुत्र भेजा है। उसकी सहायता करनी चाहिए।”
राजा ने उसी दिन सत्यदास की मासिक दक्षिणा बढ़ा दी।
कुछ दिनों बाद सत्यदास राजमहल आया। राजा ने बढ़ी हुई दक्षिणा उसके हाथ में रखी, लेकिन सत्यदास ने न कोई प्रश्न किया और न ही विशेष प्रसन्नता दिखाई। उसने सिर झुकाकर धन स्वीकार किया और भगवान को धन्यवाद दिया।
कुछ महीनों बाद सत्यदास फिर एक दिन राजमहल नहीं आया। इस बार राजा को बहुत क्रोध आया। उन्होंने सोचा, “मैंने इसकी सहायता की, इसकी दक्षिणा बढ़ाई, फिर भी यह अपने कर्तव्य में लापरवाही कर रहा है।”
राजा ने उसकी दक्षिणा फिर पहले जितनी कर दी।
जब सत्यदास को यह पता चला तो उसने तब भी कोई शिकायत नहीं की।
राजा को आश्चर्य हुआ। उन्होंने उसे बुलाकर पूछा,
“सत्यदास! जब मैंने तुम्हारी दक्षिणा बढ़ाई तब भी तुमने कुछ नहीं कहा और अब मैंने घटा दी, तब भी तुम्हारे चेहरे पर चिंता नहीं है। आखिर इसका रहस्य क्या है?”
सत्यदास ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“महाराज, जिस दिन मैं सेवा में नहीं आया था, उस दिन मेरे घर पुत्र का जन्म हुआ था। जब आपने मेरी दक्षिणा बढ़ाई, मैंने समझ लिया कि मेरे पुत्र के पालन-पोषण का साधन स्वयं भगवान ने आपके हाथों भेज दिया है। इसलिए मैंने उसे अपना अधिकार नहीं, प्रभु का प्रसाद माना।”
राजा ध्यान से सुनते रहे।
सत्यदास ने आगे कहा—
“और जिस दिन मैं दूसरी बार अनुपस्थित रहा, उस दिन मेरी वृद्ध माता ने संसार छोड़ दिया। जब आपने मेरी दक्षिणा कम कर दी तो मैंने समझ लिया कि जिस माँ का जीवनभर पालन करने का सौभाग्य मुझे मिला, वह अपने हिस्से की चिंता और अपना ऋण अपने साथ लेकर प्रभु के पास चली गई।”
राजा की आँखें नम हो गईं।
सत्यदास ने हाथ जोड़कर कहा—
“महाराज, धन बढ़ने पर अहंकार क्यों करूँ और घटने पर दुख क्यों करूँ? धन मेरा था ही कब? जो मिला, वह प्रभु की कृपा थी और जो चला गया, वह भी उसी की इच्छा थी।”
राजा धर्मकेतु कुछ क्षण मौन रहे। फिर सिंहासन से उठकर सत्यदास के पास आए और बोले—
“आज तुमने मुझे राजधर्म से भी बड़ी बात सिखा दी। राज्य चलाने के लिए बुद्धि चाहिए, लेकिन जीवन चलाने के लिए विश्वास चाहिए।”
उस दिन राजा ने सत्यदास को सम्मानित किया और कहा—
“मनुष्य का कर्तव्य कर्म करना है, फल की चिंता करना नहीं। जो हमारे पास है, वह प्रभु की देन है और जो नहीं है, उसके पीछे भी कोई कारण अवश्य है।”
सत्यदास मुस्कुराया और बोला—
“जिसे प्रभु ने दिया, वह पर्याप्त है;
जिसे नहीं दिया, उसकी भी कोई आवश्यकता नहीं होगी।
मन शांत हो तो छोटी-सी कुटिया भी महल है,
और मन अशांत हो तो महल भी कारागार है।”
जीवन में सुख आए तो अहंकार मत कीजिए और दुख आए तो निराश मत होइए। ईश्वर पर विश्वास रखकर अपना कर्म करते रहिए। जो प्राप्त है, उसे प्रसाद समझकर स्वीकार करना ही सच्चे संतोष और सुख का मार्ग है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
