पचहत्तर वर्षीय प्रकाश जी आँगन में अपने तख्त पर बैठे थे। सुबह से उन्होंने केवल चार बिस्कुट और एक कप चाय ली थी। दोपहर का समय हो चुका था और उन्हें बहुत तेज भूख लग रही थी।
घर के भीतर उनका पोता-पोती भोजन कर रहे थे। प्रकाश जी ने बहू को कई बार आवाज लगाई, लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला। वे चुपचाप तख्त पर बैठे रहे। सामने से कभी समोसे वाला निकलता, कभी पकौड़ी वाला। भोजन की सुगंध उनके मन की भूख को और बढ़ा देती।
सामान्य दिनों में सुबह बच्चों के विद्यालय जाने के लिए भोजन बनता तो एक पराठा प्रकाश जी को भी मिल जाता था। लेकिन रविवार को भोजन देर से बनता था। आज बच्चों को भोजन मिल गया था, पर घर के उस बुजुर्ग को कोई पूछने वाला नहीं था।
प्रकाश जी प्रातः ही स्नान करके भगवान की पूजा कर चुके थे और तब से भोजन की प्रतीक्षा कर रहे थे।
जब भूख सहन नहीं हुई तो वे धीरे-धीरे तख्त से उठे और काँपते कदमों से रसोई में पहुँचे। बहू ने उन्हें आते देखा तो अपना सिर ढक लिया।
प्रकाश जी ने बिना कुछ कहे भोजन की थाली निकाली। बहुत समय बाद वे रसोई में आए थे, इसलिए उन्हें बर्तन ढूँढ़ने में भी कठिनाई हो रही थी। उन्होंने भोजन पात्र से दो रोटियाँ निकालीं, कुकर से चावल लिए, सब्जी और दाल थाली में रखी।
फिर उनकी दृष्टि शीतकपाट में रखे दही पर पड़ी। उनका मन ललचा उठा। उन्होंने एक छोटी कटोरी में दही लिया और बहू से बोले, “बेटी, इसमें थोड़ा मीठा चूर्ण डाल दे। मेरी आँखें अब ठीक से दिखाई नहीं देतीं।”
बहू ने चुपचाप दो चम्मच मीठा चूर्ण डाल दिया।
प्रकाश जी बोले, “एक चम्मच और डाल दे।”
बहू ने डाल दिया।
दरअसल, बेटे ने सर्दियों में प्रकाश जी को दही देने से मना किया था, क्योंकि उन्हें जल्दी सर्दी-जुकाम हो जाता था। लेकिन उस दिन बहू ने कुछ नहीं कहा।
प्रकाश जी अपनी थाली लेकर वापस तख्त पर आ गए। भगवान को स्मरण करके उन्होंने भोजन करना शुरू किया। साधारण भोजन भी उन्हें आज किसी पर्व के भोजन जैसा स्वादिष्ट लग रहा था। दही के साथ रोटी खाते हुए उनके चेहरे पर संतोष की मुस्कान आ गई।
दरवाजे के पीछे खड़ी बहू सब देख रही थी। उसके मन में अचानक विचार आया—
“भोजन तो रोज जैसा ही था। आज बच्चों ने खाने के लिए बहुत आग्रह किया, इसलिए मैंने पहले उन्हें खिला दिया। लेकिन मैं यह भूल गई कि इस घर में एक और बच्चा भी है… जो पैर पटककर अपनी भूख नहीं बताता, लेकिन उसे भी भूख लगती है।”
उसकी आँखें नम हो गईं।
अगले दिन से प्रकाश जी के लिए भोजन समय पर अलग रख दिया जाने लगा। बहू उनके लिए प्रतिदिन गर्म भोजन परोसती और सर्दियों में उनकी आवश्यकता के अनुसार गर्म छाछ भी देती।
अब प्रकाश जी को भोजन माँगने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। बहू स्वयं समय पर उनकी थाली लेकर खाट के पास पहुँच जाती।
प्रकाश जी प्रसन्न होकर उसके सिर पर हाथ रखते और आशीर्वाद देते।
उन्हें लगता था कि बहू ने केवल भोजन नहीं दिया, बल्कि उनके सम्मान और अपनत्व को भी लौटा दिया है।
बुजुर्ग घर का बोझ नहीं, घर की नींव होते हैं। जिस प्रकार छोटे बच्चे अपनी आवश्यकता स्वयं नहीं समझा पाते, उसी प्रकार वृद्ध भी कई बार अपनी भूख, पीड़ा और आवश्यकता कह नहीं पाते। इसलिए उनके बोलने की प्रतीक्षा न करें। समय पर दिया गया भोजन, सम्मान के दो शब्द और प्रेम से रखा गया हाथ उनके लिए संसार की सबसे बड़ी संपत्ति हो सकते हैं।
जिस घर के बड़े-बुजुर्ग संतुष्ट रहते हैं, उस घर में सुख और आशीर्वाद स्वयं चले आते हैं।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
