एक समय की बात है—एक प्रतापी राजा अपने तेजस्वी घोड़े पर सवार होकर अकेले ही वन की ओर निकल पड़े। वन का वातावरण शांत था, पर हवा में एक अनजानी आशंका घुली हुई थी।
चलते-चलते राजा जब डाकू-भीलों की झोंपड़ियों के पास पहुँचे, तभी एक झोंपड़ी के द्वार पर पिंजरे में बंद एक तोते ने उन्हें देखते ही कर्कश स्वर में चिल्लाना शुरू कर दिया—“दौड़ो! पकड़ो! मार डालो इसे! घोड़ा छीन लो! गहने छीन लो!” तोते के ये शब्द राजा के कानों में पड़ते ही बिजली की तरह गिरे। राजा समझ गए कि वे एक खतरनाक बस्ती में आ चुके हैं।
बिना एक पल गंवाए उन्होंने अपने उत्तम घोड़े की लगाम कस दी और उसे पूरी शक्ति से दौड़ा दिया। पीछे-पीछे डाकू भीलों ने उनका पीछा किया, पर राजा का घोड़ा बिजली की फुर्ती से कुछ ही क्षणों में इतनी दूर निकल गया कि डाकू हताश होकर लौट गए। आगे बढ़ते-बढ़ते वन का दृश्य बदलने लगा—अब वहाँ शांति थी, हरियाली थी और तपस्या की सुगंध थी। थोड़ी दूर पर ऋषि-मुनियों का एक आश्रम दिखाई दिया।
जैसे ही राजा एक कुटिया के सामने से गुज़रे, वहाँ पिंजरे में बैठा दूसरा तोता उन्हें देखते ही मधुर स्वर में बोल उठा—“आइए राजन्! आपका स्वागत है! अतिथि पधारे हैं! अर्घ्य लाओ, आसन लाओ!” इस आत्मीय पुकार को सुनते ही मुनि कुटिया से बाहर आए और उन्होंने राजा का विधिवत सत्कार किया। कुछ समय पश्चात, आतिथ्य स्वीकार कर राजा के मन में एक जिज्ञासा उठी। उन्होंने विनम्रता से पूछा—“महाराज! एक ही जाति के दो पक्षियों के स्वभाव में इतना गहरा अंतर कैसे हो सकता है?” इससे पहले कि मुनि उत्तर देते, आश्रम का तोता स्वयं बोल पड़ा—“राजन! हम दोनों एक ही माता-पिता की संतान हैं। अंतर बस इतना है कि उसे डाकू ले गए और मुझे इन मुनियों का सान्निध्य मिला। वह हिंसा, लूट और क्रूरता की बातें सुनता रहा, इसलिए उसकी वाणी वैसी हो गई; और मैं करुणा, सेवा और सद्भाव के वचन सुनता रहा, इसलिए मेरी वाणी और स्वभाव वैसे बन गए। आपने स्वयं देख लिया कि संगति किस प्रकार प्राणी के भीतर गुण या दोष भर देती है।” राजा इस उत्तर को सुनकर गहन विचार में डूब गए।
उन्हें शास्त्रों का वह वचन स्मरण हो आया—“संसर्गजा दोष-गुणा भवन्ति”, अर्थात् संग से ही गुण और दोष उत्पन्न होते हैं।
यह कथा केवल एक राजा और दो तोतों की नहीं, बल्कि हर मनुष्य के जीवन का दर्पण है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, वैसे-वैसे माता-पिता, परिवार, पड़ोस, वातावरण और मित्रों की संगति उसके विचार, वाणी और कर्म को आकार देती है। अच्छी संगति मनुष्य को ऊँचाइयों तक ले जाती है, जबकि बुरी संगति धीरे-धीरे उसके भीतर के श्रेष्ठ गुणों को भी नष्ट कर देती है। इसलिए आवश्यक है कि हम स्वयं भी सत्संग चुनें और अपनी आने वाली पीढ़ी को भी अच्छे संस्कार, सही वातावरण और सकारात्मक संगति दें, ताकि उनके भीतर मानवता, विवेक और सदाचार का विकास हो सके।
यही इस कथा का मर्म है—जैसा संग, वैसा रंग; और जैसा रंग, वैसा जीवन।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
