स्कूल का छात्र गुर्वित अपनी उम्र के बच्चों से कहीं अधिक समझदार था, लेकिन उसकी एक आदत सभी को परेशान करती थी—वह हर थोड़ी देर में मोबाइल फोन उठाकर देखने लगता था। कभी गेम, कभी वीडियो, कभी सोशल मीडिया… जैसे फोन उसके हाथ नहीं, उसकी जिंदगी का रिमोट बन गया हो।
घरवाले रोज़ उसे समझाते, “गुर्वित, मोबाइल कम चलाया करो, यह तुम्हारा समय खा रहा है।” लेकिन वह हमेशा कहता, “बस एक मिनट!” और यही “एक मिनट” हर दिन घंटों में बदल जाता। धीरे-धीरे उसकी पढ़ाई गिरने लगी। मिड-टर्म परीक्षा में उसके बहुत कम नंबर आए। रिपोर्ट कार्ड देखकर वह खुद भी घबरा गया—जो लड़का हमेशा क्लास में आगे रहता था, वह इस बार 17वीं रैंक पर आ गया था।
घर पहुँचकर उसकी माँ ने शांत आवाज़ में कहा, “बेटा, हम तुम्हें मोबाइल से नहीं, तुम्हारे बिगड़ते भविष्य से डरते हैं।” माँ की बात ने उसके दिल पर गहरा असर किया। रात को जब उसने फोन उठाया, तो स्क्रीन पर अपना थका और बिखरा चेहरा देखकर उसे गहरी शर्म महसूस हुई।
उसी पल उसने फैसला किया—अब फोन बस एक घंटे, बाकी समय पढ़ाई और अपने लक्ष्यों को। शुरुआत मुश्किल थी; आदतें बार-बार खींचती थीं, उंगलियाँ खुद फोन खोलना चाहती थीं, लेकिन गुर्वित ने खुद को काबू में रखना सीख लिया।
कुछ ही हफ्तों में उसके अंदर अद्भुत बदलाव आने लगा—एकाग्रता बढ़ी, पढ़ाई में रुचि बढ़ी, और उसी मेहनत का फल यह हुआ कि अगले एग्जाम में उसने शानदार नंबर हासिल किए। टीचर ने क्लास के सामने कहा, “गुर्वित, तुमने साबित किया कि सबसे बड़ी जीत अपनी कमजोरियों पर जीत होती है।” घरवालों की आँखों में गर्व झलक उठा, और गुर्वित समझ गया कि मोबाइल नहीं, अनुशासन ही जीवन बदलता है।
फोन को संभालकर चलाना सीखो; कहीं ऐसा न हो कि फोन तुम्हारे भविष्य को ही निगल जाए।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
