नवरात्रि शुरू होने वाली थी। मंदिर की सजावट और व्रत का सामान खरीदने के लिए प्रिया अपनी दोनों ननदों—रीमा और सीमा—के साथ बाजार निकल पड़ी। पूरा बाजार रोशनी, सजावट और दुकानों की रंग-बिरंगी रौनक से जगमगा रहा था। भीड़ इतनी थी कि एक-दूसरे के साथ चलना भी मुश्किल हो रहा था।
तीनों ननद-भाभियां कभी चुनरी की दुकान पर जातीं, तो कभी पूजा की सामग्री देखने लगतीं। इसी बीच भीड़ का फायदा उठाकर एक युवक पीछे से रीमा को गलत तरीके से छूने लगा। अचानक प्रिया की नजर उस पर पड़ गई। उसका खून खौल उठा। वह युवक को पकड़कर सबके सामने उसका विरोध करने ही वाली थी कि तभी उसे पिछली बार ट्रेन में हुई एक घटना याद आ गई।
रीमा भी चुप थी।
प्रिया ने सोचा, “जब दीदी ही विरोध नहीं कर रही हैं, तो मैं क्यों बोलूं?”
वह मन मसोसकर रह गई।
कुछ देर बाद तीनों फिर सामान खरीदने में व्यस्त हो गईं। तभी अचानक उसी युवक ने पीछे से प्रिया को भी गलत तरीके से छू दिया।
इस बार प्रिया बिना एक पल गंवाए बिजली की गति से पलटी और चटाक! एक जोरदार थप्पड़ उसके गाल पर जड़ दिया।
भीड़ में खड़े लोग चौंककर उनकी ओर देखने लगे।
युवक अकड़कर बोला, “मुझे थप्पड़ क्यों मारा? मैंने क्या किया है?”
प्रिया गुस्से में बोली, “पूरी भीड़ के सामने बताऊं कि तूने क्या किया है? बोल! क्या तूने मुझे गलत तरीके से नहीं छुआ?”
इतना सुनते ही कुछ दुकानदार आगे बढ़े और बोले, “पकड़ो इसे! भागने मत देना!”
भीड़ का रुख देखकर युवक वहां से भाग खड़ा हुआ।
रीमा और सीमा प्रिया के पास आईं। रीमा धीमे स्वर में बोली, “भाभी, आप जहां जाती हैं, कोई न कोई बखेड़ा खड़ा कर देती हैं। पिछली बार ट्रेन में भी आपने ऐसा ही किया था। आखिर ऐसी घटनाएं सिर्फ आपके साथ ही क्यों होती हैं? बाजार में तो कितनी लड़कियां थीं।”
प्रिया ने शांत होकर पूछा, “दीदी, सच-सच बताइए… क्या आपके साथ कभी ऐसा नहीं हुआ?”
रीमा चुप रही।
प्रिया ने फिर पूछा, “अभी थोड़ी देर पहले आपके साथ जो हुआ, क्या वह आपको याद नहीं? फिर आप कैसे कह सकती हैं कि दूसरी लड़कियों के साथ ऐसा नहीं होता?”
पास खड़ी दो-तीन लड़कियों ने भी नजरें झुका लीं। उनके मौन ने बहुत कुछ कह दिया।
प्रिया बोली, “दीदी, सच यह है कि ऐसी हरकतें बहुत-सी लड़कियों के साथ होती हैं। लेकिन वे डरती हैं—लोग क्या कहेंगे, कहीं उन्हें ही गलत न समझ लिया जाए, कहीं बात बढ़ न जाए। और हमारी यही चुप्पी ऐसे लोगों को हिम्मत देती है।”
फिर उसने दृढ़ स्वर में कहा, “हम बखेड़ा खड़ा होने से क्यों डरें? क्यों न इस बखेड़े का डर उनके मन में पैदा किया जाए, ताकि अगली बार किसी लड़की को गलत तरीके से छूने से पहले उन्हें सौ बार सोचना पड़े?”
रीमा की आंखें नम हो गईं।
“तुम सही कह रही हो भाभी। हमारे साथ भी कई बार ऐसा हुआ है, लेकिन हम चुप रहे। अब आगे से चुप नहीं रहेंगे।”
पास खड़ी लड़कियों ने भी कहा, “हम भी विरोध करेंगे।”
प्रिया के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
उस दिन बाजार से केवल नवरात्रि का सामान नहीं आया था, बल्कि कई महिलाओं के मन से डर की एक गांठ भी खुल गई थी।
अन्याय का विरोध करना बखेड़ा खड़ा करना नहीं है। गलत व्यवहार के सामने आवाज उठाना अपने सम्मान और सुरक्षा के लिए खड़ा होना है। जब कोई गलत करे, तो सुरक्षित तरीके से उसका विरोध करें और जरूरत पड़ने पर परिवार, आसपास के लोगों या कानून की मदद लें।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
