” ईमानदारी का फल मीठा “

एक छोटे से गाँव में सोहनलाल नाम का एक गरीब लेकिन ईमानदार आदमी रहता था। वह रोज खेतों से ताजे फल खरीदकर अपनी ठेली पर बेचता था। उसके फल इतने ताजे और स्वादिष्ट होते कि गाँव के लोग उसकी ठेली पर फल खरीदने के लिए इंतजार करते थे।

एक दिन गाँव का एक सेठ उसकी ठेली पर आया।

सेठ बोला, “सोहनलाल, तुम्हारे फल तो बहुत जल्दी बिक जाते हैं, लेकिन गाँव में सस्ते दामों पर बेचकर तुम्हें ज्यादा बचत नहीं होती होगी। मैं गाँव से फल खरीदकर शहर ले जाता हूँ। वहाँ उन्हीं फलों के अच्छे दाम मिलते हैं। तुम भी शहर में दुकान क्यों नहीं लगा लेते?”

सोहनलाल मुस्कुराकर बोला, “सेठ जी, शहर पहुँचते-पहुँचते आपके बहुत से फल खराब भी हो जाते होंगे।”

सेठ हँसते हुए बोला, “अरे भाई! शहर वालों को क्या पता कौन-सा फल ताजा है और कौन-सा खराब। थोड़ा बहुत सड़ा फल भी अच्छे दाम में बिक जाता है।”

सोहनलाल ने गंभीर होकर कहा, “सेठ जी, मैं किसी की मजबूरी और अनजानपन का फायदा उठाकर उसे खराब फल नहीं खिला सकता। कम कमाऊँगा, लेकिन ईमानदारी से कमाऊँगा।”

अगले दिन सेठ शहर लौट गया।

कुछ दिनों बाद सोहनलाल ने देखा कि एक पेड़ के नीचे एक बूढ़ी माँ बहुत कमजोर अवस्था में पड़ी थी। सोहनलाल तुरंत उसके पास गया।

“माँजी, आपकी तबीयत ठीक नहीं लग रही?”

बूढ़ी माँ बोली, “बेटा, मेरा बेटा और बहू शहर गए हैं। मैं अकेली रहती हूँ। वैद्य ने दवा दी है और खाना खाने के बाद दवा लेने को कहा है, लेकिन मुझमें खाना बनाने की ताकत नहीं है।”

सोहनलाल तुरंत अपनी ठेली से ताजे फल लाया और बोला, “माँजी, आज से जब तक आप ठीक नहीं हो जातीं, आपको खाना बनाने की जरूरत नहीं। मैं रोज आपके लिए फल लेकर आऊँगा।”

बूढ़ी माँ बोली, “लेकिन बेटा, मेरे पास पैसे नहीं हैं।”

सोहनलाल मुस्कुराया, “माँ का आशीर्वाद किसी कीमत से कम नहीं होता।”

सोहनलाल रोज उसे फल पहुँचाने लगा। कुछ ही दिनों में बूढ़ी माँ स्वस्थ हो गई।

समय बीतता गया।

एक दिन एक महिला सोहनलाल के पास आई और बोली, “भैया, मेरे पति बहुत बीमार हैं। हम सामने वाले घर में रहते हैं। आप रोज हमारे लिए ताजे फल पहुँचा दिया करना।”

अगले दिन सोहनलाल फल लेकर उनके घर पहुँचा। कई बार आवाज लगाने के बाद भी कोई बाहर नहीं आया। वह अंदर गया तो बिस्तर पर पड़े व्यक्ति को देखकर हैरान रह गया।

वह वही सेठ था!

सेठ ने अपनी कहानी सुनाई। लालच में उसने ग्राहकों को खराब फल बेचने शुरू कर दिए थे और फलों को रसायनों से चमकाने लगा था। एक दिन उसके जहरीले फल खाने से एक बच्चे की मौत हो गई। लोगों ने उसकी दुकान जला दी और वह सब कुछ खोकर गाँव आ गया।

सेठ रोते हुए बोला, “आज मेरे पास न पैसा है, न सम्मान और न स्वास्थ्य।”

सोहनलाल ने कहा, “सेठ जी, धन कमाने के लिए आपने ईमानदारी खो दी, लेकिन मैंने ईमानदारी बचाकर अपना सब कुछ बचा लिया।”

फिर भी उसने सेठ का साथ नहीं छोड़ा। वह रोज उसके घर ताजे फल पहुँचाने लगा। कुछ ही दिनों में सेठ स्वस्थ हो गया। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने सोहनलाल के साथ मिलकर गाँव में ताजे फल बेचने की छोटी-सी दुकान खोल ली।

कुछ समय बाद वही बूढ़ी माँ अपने बेटे के साथ सोहनलाल की दुकान पर आई। बेटे ने सोहनलाल के पैर छूकर कहा—

“भैया, आपने मेरी माँ की जान बचाई है। मैं आपका एहसान कभी नहीं भूलूँगा। मैं इसी जिले में कलेक्टर बनकर आया हूँ। अगर आपको कभी कोई परेशानी हो, तो मुझे जरूर बताइएगा।”

सोहनलाल की आँखें नम हो गईं।

उसे उस दिन समझ आया कि इंसान की असली कमाई उसकी जेब में नहीं, उसके अच्छे कर्मों में होती है।

ईमानदारी का रास्ता भले ही शुरुआत में कठिन लगे, लेकिन उसका फल हमेशा मीठा होता है। लालच कुछ समय के लिए धन दे सकता है, मगर अच्छे कर्म पूरी जिंदगी सम्मान देते हैं।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार        !

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *