” असली शिक्षा की पहचान “

एक बड़े शहर के व्यस्त बाजार में सुबह से ही चहल-पहल थी। दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ लगी हुई थी। उसी समय एक चमचमाती लग्ज़री कार आकर सब्ज़ी मंडी के सामने रुकी। कार के अंदर बैठी एक अमीर महिला मोबाइल पर किसी से बात कर रही थी। उसने अपनी लगभग दस साल की बेटी से कहा, “जाओ, उस बूढ़ी औरत से पूछो कि सब्ज़ी कितने की है।”

बेटी कार से उतरी और बिना किसी सम्मान के बोली, “अरे बुढ़िया! ये सब्ज़ी कितने की दी?”

सब्ज़ी बेचने वाली वृद्धा ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “बेटी जी, चालीस रुपये किलो है।”

लड़की ने सब्ज़ी ली और सौ रुपये का नोट उसकी ओर फेंक दिया। फिर बिना बाकी पैसे लिए कार में बैठ गई। कार आगे बढ़ने ही वाली थी कि तभी लगभग बारह साल की एक लड़की दौड़ती हुई आई और कार का शीशा खटखटाने लगी।

महिला ने शीशा नीचे किया तो लड़की ने दोनों हाथों से साठ रुपये आगे बढ़ाते हुए कहा, “आंटी जी, ये आपके बचे हुए पैसे हैं। आपकी बेटी भूल गई थी।”

महिला ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, तुम ही रख लो।”

लड़की ने विनम्रता से सिर झुकाकर कहा, “नहीं आंटी जी। जितने हमारे बनते थे, हमने ले लिए। मेहनत की कमाई से ज़्यादा लेना हमें माँ ने कभी नहीं सिखाया। हमें खुशी होगी अगर आपको हमारी सब्ज़ियाँ पसंद आएँ और आप फिर से हमारी दुकान पर आएँ।”

इतना कहकर उसने हाथ जोड़कर नमस्ते की और वापस अपनी दुकान की ओर चली गई।

महिला उस बच्ची की ईमानदारी और शालीनता देखकर हैरान रह गई। उसके मन में उत्सुकता हुई कि आखिर इतनी छोटी बच्ची में इतने अच्छे संस्कार कैसे आए?

वह कार से उतरकर चुपचाप सब्ज़ी की दुकान के पास पहुँची। वहाँ उसने देखा कि वही वृद्धा अपनी बेटी से प्यार से पूछ रही थी, “बेटी, तुमने ग्राहक से आदर से बात की ना? किसी को बुरा तो नहीं लगा?”

लड़की मुस्कुराकर बोली, “हाँ माँ। आपने सिखाया है कि हर इंसान सम्मान के योग्य होता है। चाहे वह अमीर हो या गरीब, छोटा हो या बड़ा, सबसे मीठी वाणी में बात करनी चाहिए।”

माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटी, धन-दौलत कभी भी कम या ज़्यादा हो सकती है, लेकिन अच्छे संस्कार ही इंसान की सबसे बड़ी पहचान होते हैं।”

लड़की बोली, “माँ, अब मैं स्कूल जा रही हूँ। छुट्टी होते ही वापस दुकान पर आ जाऊँगी।”

यह सब सुनकर कार वाली महिला की आँखें झुक गईं। उसे अपनी गलती का एहसास हो चुका था। उसने महसूस किया कि उसने अपनी बेटी को अच्छे संस्कार देने के बजाय लोगों में ऊँच-नीच का भेद सिखाया था, जबकि एक साधारण सब्ज़ी बेचने वाली अपनी बेटी को इंसानियत, ईमानदारी और सम्मान का सबसे बड़ा पाठ पढ़ा रही थी।

घर लौटते समय उसने अपनी बेटी से कहा, “बेटा, आज मुझे समझ आया कि असली अमीरी पैसे में नहीं, बल्कि संस्कारों में होती है। आज से हम हर व्यक्ति से सम्मानपूर्वक बात करेंगे, क्योंकि इंसान की पहचान उसके कपड़ों या पैसे से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से होती है।”

उस दिन के बाद माँ और बेटी दोनों बदल गए। अब वे हर छोटे-बड़े व्यक्ति का सम्मान करते, मधुर वाणी बोलते और हर किसी के साथ समान व्यवहार करते थे। धीरे-धीरे उनकी यही आदत उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गई।

बच्चों को ऊँचा पद, बड़ा घर या अधिक धन नहीं, बल्कि विनम्रता, ईमानदारी, मधुर वाणी और सभी का सम्मान करना सिखाइए। क्योंकि अच्छे संस्कार ही वह धन हैं, जो जीवनभर साथ रहते हैं और इंसान को सच्चा महान बनाते हैं।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार      !

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