बस से उतरते ही मैंने अपनी पैंट की जेब में हाथ डाला तो अचानक मेरे कदम रुक गए। जेब का एक हिस्सा कटा हुआ था। मैंने घबराकर दूसरी जेबें टटोलीं, लेकिन वहाँ भी कुछ नहीं मिला।
मेरी जेब कट चुकी थी।
जेब में था भी क्या? केवल 70 रुपए और एक अधूरा-सा खत, जो मैंने अपनी माँ के नाम लिखा था।
उस खत में मैंने लिखा था—
“माँ, मेरी नौकरी छूट गई है। इस महीने मैं तुम्हें पैसे नहीं भेज पाऊँगा। तुम अपना ध्यान रखना…”
लेकिन पिछले तीन दिनों से वह खत मेरी जेब में ही पड़ा था। मैं उसे पोस्ट करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। मुझे डर था कि यह खबर पढ़कर माँ कितनी परेशान हो जाएगी। वह गाँव में अकेली रहती थी और हर महीने मेरे भेजे पैसों से ही अपना गुजारा करती थी।
70 रुपए किसी अमीर आदमी के लिए शायद बहुत छोटी रकम हो, लेकिन जिसकी नौकरी चली गई हो और जिसके पास कमाने का कोई साधन न हो, उसके लिए 70 रुपए भी 700 रुपए से कम नहीं होते।
मैं उदास मन से अपने कमरे पर लौट आया। उस रात मैं देर तक सोचता रहा—अब माँ को क्या लिखूँगा? उसे पैसे कैसे भेजूँगा? वह क्या खाएगी?
कुछ दिन बाद डाकिया मेरे नाम एक पत्र देकर चला गया। लिफाफे पर माँ की लिखावट थी।
मेरे हाथ काँपने लगे।
मैंने सोचा, “शायद माँ ने पैसे माँगे होंगे… शायद घर में राशन खत्म हो गया होगा…”
डरते-डरते मैंने पत्र खोला।
लेकिन माँ के शब्द पढ़कर मैं हैरान रह गया।
माँ ने लिखा था—
“बेटा, तेरे भेजे हुए 2000 रुपए का मनीऑर्डर मिल गया है। तू कितना अच्छा है! तूने कभी पैसे भेजने में लापरवाही नहीं की। भगवान तुझे हमेशा खुश रखे। मैंने तेरे लिए मंदिर में प्रार्थना की है।”
पत्र पढ़ते ही मेरी आँखें भर आईं।
मैं सोचने लगा—
“मैंने तो कोई पैसा भेजा ही नहीं… फिर माँ को 2000 रुपए किसने भेजे?”
यह रहस्य कई दिनों तक मेरे मन में घूमता रहा।
फिर एक दिन मुझे एक और पत्र मिला। उस पत्र पर न कोई पूरा पता था और न ही भेजने वाले का नाम। उसमें टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं—
“भाई, तुम्हारे 70 रुपए और अपनी तरफ से 1930 रुपए मिलाकर मैंने तुम्हारी माँ को मनीऑर्डर भेज दिया है।
चिंता मत करना…
माँ तो सबकी एक जैसी होती है न?
क्या तेरी माँ और क्या मेरी माँ…
माँ आखिर माँ होती है।
वह भूखी क्यों रहे?”
पत्र के अंत में केवल इतना लिखा था—
“तुम्हारी जेब काटने वाला जेबकतरा।”
यह पढ़ते ही मेरी आँखों से आँसू बहने लगे।
जिस व्यक्ति को मैं चोर समझकर कोस रहा था, उसने मेरी माँ की भूख और मेरी मजबूरी को समझ लिया था।
उसने मेरी जेब से केवल 70 रुपए नहीं निकाले थे… उसने मेरे अधूरे खत में छिपा एक बेटे का दर्द पढ़ लिया था।
उस दिन मुझे समझ आया कि हर इंसान केवल अपने काम से अच्छा या बुरा नहीं होता। कभी-कभी किसी गलत राह पर चलने वाले इंसान के दिल में भी इंसानियत जिंदा होती है।
किसी इंसान की पहचान केवल उसके बाहरी कामों से नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपी दया, करुणा और इंसानियत से होती है। माँ का रिश्ता हर दिल को जोड़ देता है।यह कहानी माँ के प्रेम, बेटे की मजबूरी और एक अनजान इंसान की करुणा को बहुत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
