भुवन जी की उम्र अब साठ के पार हो चुकी थी। जीवन में उन्होंने खूब मेहनत की थी। नौकरी, परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियाँ निभाते-निभाते कब उम्र ढल गई, उन्हें पता ही नहीं चला। अब वे सोचते थे कि बुढ़ापे में थोड़ा आराम करेंगे, पत्नी के साथ समय बिताएँगे और जीवन को सहजता से जिएँगे।
लेकिन कुछ दिनों से उनके मन में अजीब-अजीब विचार उठने लगे थे।
उनके पुराने मित्र शास्त्री जी ज्योतिष का अच्छा ज्ञान रखते थे। भुवन जी बार-बार उनसे मिलने लगे।
एक दिन भुवन जी ने पूछा, “शास्त्री जी, मेरी मृत्यु कब होगी?”
शास्त्री जी चौंक गए। उन्होंने मुस्कराकर कहा, “भुवन जी, आप जैसे सकारात्मक व्यक्ति को ऐसे सवाल शोभा नहीं देते।”
भुवन जी बोले, “पता नहीं क्यों, पिछले कुछ दिनों से मन में अनहोनी का डर बैठ गया है। लगता है जैसे जीवन हाथ से फिसल रहा है।”
शास्त्री जी ने समझाया, “भविष्य जानने की कोशिश में वर्तमान क्यों खराब करते हैं? जीवन का हर पल अनमोल है। उसे डर में नहीं, खुशी में बिताइए।”
पर भुवन जी के मन में डर का झाग उठ चुका था। जितना उसे हटाने की कोशिश करते, उतना ही वह फैलता जाता।
एक सुबह उनकी पत्नी ने देखा कि भुवन जी चुपचाप बैठे हैं।
“क्या हुआ?” उसने पूछा।
“कुछ नहीं,” भुवन जी ने कहा, “बस सोच रहा हूँ कि अगर मुझे कुछ हो गया तो तुम्हारा क्या होगा?”
पत्नी मुस्कराई, “इतने साल साथ बिताने के बाद भी आप मुझे कमजोर समझते हैं? और फिर अभी तो हमें बहुत जीना है।”
उस दिन दोनों ने तय किया कि अब वे हर छोटी बात को लेकर चिंता नहीं करेंगे।
कुछ दिनों बाद पत्नी को डॉक्टर के पास जाना था। भुवन जी स्वयं कार चलाकर उसे अस्पताल ले गए। रास्ते में वे पत्नी से बातें करते रहे। अस्पताल पहुँचकर डॉक्टर ने कुछ जाँचें लिखीं और उन्हें आराम करने की सलाह दी।
रात को घर लौटते समय भुवन जी अचानक बोले, “देखो, आज पूरा दिन कितना अच्छा बीता। बेकार ही मैं भविष्य की चिंता में अपना वर्तमान खराब कर रहा था।”
पत्नी ने उनका हाथ पकड़कर कहा, “चिंता भी झाग जैसी होती है। पानी में उठती है, थोड़ी देर चमकती है और फिर अपने आप खत्म हो जाती है। बस हमें उसे समुद्र समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।”
भुवन जी हँस पड़े।
अगले दिन वे शास्त्री जी के पास पहुँचे।
शास्त्री जी ने पूछा, “अब कैसी तबीयत है?”
भुवन जी बोले, “बिल्कुल ठीक! अब मैंने मृत्यु की तारीख पूछना छोड़ दिया है। मैंने आज का दिन जीना शुरू कर दिया है।”
शास्त्री जी मुस्कराए।
“बस यही असली ज्योतिष है—भविष्य चाहे जैसा हो, वर्तमान को सुंदर बनाना हमारे हाथ में है।”
उस दिन के बाद भुवन जी ने सुबह टहलना, पत्नी के साथ बातें करना, पुराने मित्रों से मिलना और बच्चों के साथ समय बिताना शुरू कर दिया।
उन्हें समझ आ गया था कि उम्र बढ़ना समस्या नहीं है, उम्र के साथ डर बढ़ाना समस्या है।
और मन में उठने वाले बेकार विचार?
वे तो बस झाग हैं—उन्हें पकड़कर रखने की जरूरत नहीं।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
