” लाल कपड़े की थैली “

कबीर नाम का मल्लाह नदी किनारे अपनी नाव ठीक कर रहा था। अचानक एक बच्चा उसके पास रोता हुआ आया और उससे बोला, “क्या तुम मेरी मदद कर सकते हो?” कबीर ने पूछा, “क्या हुआ है?” बच्चा बोला, “मेरी मां बहुत बीमार है, उस पार तक उसे ले जाना है।” कबीर को उस बच्चे पर दया आई और उसने उन दोनों को नदी पार पहुंचा दिया। बच्चे ने उसे धन्यवाद दिया। कबीर घर लौट आया।

शाम ढले जैसे ही वह खाना-खाने बैठा कि बाहर दरवाजे पर उसे आवाज आई, “भूखा हूं, कुछ खाने को दे दो।” कबीर ने अपनी पत्नी से कहा, “जाओ, उस भूखे को खाने को दे दो।” लेकिन वह गुस्से से बोली, “मेरी समझ में नहीं आता कि तुम लोगों के साथ जरूरत से ज्यादा हमदर्दी क्यों करते हो? अब बेटी की शादी आने वाली है, देखती हूं कौन मदद करता है तुम्हारी।”

कबीर मुस्कराते हुए बोला, “भाग्यवान ! मैं सोचता हूं कि मैं उनकी जगह होता, तो उनसे क्या उम्मीद करता।”

बात आई-गई हो गई। बेटी की शादी सिर पर आ गई। चार दिन रह गए थे। मन थोड़ा परेशान था। रोज की तरह सुबह कबीर नदी किनारे पहुंचा। जैसे ही वह नाव लेकर पानी की तरफ बढ़ा कि उसकी नजर नाव में पड़ी एक लाल कपड़े की थैली पर गई। उसने थैली खोली, तो हैरान रह गया उसमें सोने के सिक्के थे। वह सोच में पड़ गया, आख़िर इसे यहां कौन रख गया? तभी उसे आवाज आई, “कुछ दिन पहले जिस बच्चे की तुमने मदद की थी, उसी ने तुम्हें ईनाम भेजा है। वह बच्चा कोई आम इंसान नहीं था। बच्चे के रूप में एक अदृश्य शक्ति थी वह । वह जानना चाहती थी कि कितने दयालु हो तुम। प्रत्येक की परीक्षा होती है एक दिन ऐसी ही।”

सच ही कहा है किसी ने, जिसका हृदय दया से भरा है, भगवान हर समय उसके साथ रहते हैं। उसकी सारी आवश्यकताए पूरी होती जाती हैं।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार        !

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