शाम का समय था। ऑफिस में छुट्टी होने वाली ही थी कि अचानक मेरे छोटे भाई का फोन आया।
“भैया, भाभी की तबीयत बहुत खराब है। आप जल्दी घर आ जाइए।”
इतना सुनते ही मेरे हाथ-पाँव फूल गए। मैं बिना देर किए ऑफिस से निकला और दौड़ता हुआ घर पहुँचा।
कमरे में देखा तो मेरी पत्नी बिस्तर पर लेटी हुई थी। चेहरा उतरा हुआ था और आँखों में आँसू थे। उसे इस हालत में देखकर मैं घबरा गया, लेकिन अपनी चिंता छिपाते हुए थोड़ा नाराज़ होकर बोला—
“एक तो मुझसे लड़ती भी हो और ऊपर से खुद को परेशान भी करती हो। खाने ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था, जो अभी तक कुछ नहीं खाया?”
मैं उसके पास बैठा और उसे सहारा देकर उठाने लगा।
“चलो, थोड़ा खाना खा लो। खाना खाओगी तभी दवा ले पाओगी और तबीयत ठीक होगी।”
वह धीरे से बोली—
“मैं कुछ नहीं खाऊँगी, जब तक आप कुछ नहीं खाएँगे।”
मैंने बात टालते हुए कहा—
“मैं खाना खा चुका हूँ।”
वह मेरी तरफ देखने लगी। फिर बोली—
“झूठ मत बोलिए। आपके चेहरे का रंग बता रहा है कि आपने सुबह से कुछ नहीं खाया।”
मैं चुप हो गया।
“हाँ… बस एक गिलास जूस पीया था।”
उसने मेरी ओर देखकर कहा—
“मैं आपको रोज समझाती हूँ कि सुबह नाश्ता करके जाइए। दोपहर का खाना भी साथ लेकर जाइए, लेकिन आप मेरी बात कहाँ मानते हैं?”
उसकी आवाज में नाराज़गी कम और चिंता ज्यादा थी।
मैंने उसका हाथ पकड़कर कहा—
“ठीक है, आज से तुम्हारी बात मानूँगा। सुबह नाश्ता भी करूँगा और लंच भी लेकर जाऊँगा। लेकिन तुम भी मुझसे एक वादा करो।”
“क्या?”
“आज के बाद अपनी छोटी-छोटी परेशानियों को लेकर रो-रोकर अपनी तबीयत खराब नहीं करोगी और समय पर खाना खाओगी।”
उसकी आँखों में फिर आँसू आ गए, लेकिन इस बार उन आँसुओं में प्यार था।
मैंने उसके आँसू पोंछे और रसोई से खाना लाकर उसे खिलाने लगा। कभी वह मुझे एक निवाला खिलाती और कभी मैं उसे।
तभी पीछे से आवाज आई—
“कैसा ये प्यार है… कैसा खुमार है…”
हम दोनों चौंक गए।
दरवाजे के पीछे मेरा छोटा भाई खड़ा मुस्कुरा रहा था। वह काफी देर से हमारी बातें सुन रहा था।
वह हँसते हुए बोला—
“वाह भैया! दुनिया के सामने तो दोनों एक-दूसरे से लड़ते हैं और यहाँ चोरी-चोरी प्यार चल रहा है!”
इतने में घर के बाकी लोग भी वहाँ आ गए और हमें देखकर हँसने लगे।
मैं शर्माते हुए बोला—
“मैं तो इसे बस समझा रहा था।”
तभी दादी माँ ने मेरे कान पकड़ लिए और मुस्कुराते हुए बोलीं—
“मुझे समझाएगा? मुझे सब पता है। हमारी शादी को पचास साल हो चुके हैं।”
फिर उन्होंने गंभीर होकर कहा—
“बेटा, पति-पत्नी का रिश्ता केवल साथ रहने का नाम नहीं है। सच्चा जीवनसाथी वही है जो दूसरे की परेशानी बिना कहे समझ सके, उसकी गलतियों पर नाराज़ होने के बजाय उसे संभाले और जरूरत पड़ने पर प्यार से समझाए।”
उन्होंने दोनों की ओर देखकर कहा—
“पति और पत्नी एक-दूसरे के पूरक होते हैं। जिंदगी में सुख-दुख आते-जाते रहते हैं, लेकिन अगर दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे रहें तो बड़ी से बड़ी परेशानी भी छोटी लगने लगती है।”
उस दिन मुझे समझ आया कि सच्चा प्रेम बड़े-बड़े वादों में नहीं, बल्कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी परवाह में छिपा होता है।
रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए प्रेम के साथ-साथ संवाद, विश्वास और परवाह जरूरी है।
अपने जीवनसाथी की छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज न करें। समय पर खाना, स्वास्थ्य का ध्यान रखना और एक-दूसरे की भावनाओं को समझना भी प्रेम का ही हिस्सा है।
जिस रिश्ते में शिकायत कम और परवाह ज्यादा हो, वही रिश्ता उम्रभर खूबसूरत बना रहता है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
