” आत्मसम्मान “

एक छोटे से गाँव में गोविंद नाम का एक साधारण व्यक्ति रहता था। वह बहुत मेहनती था, लेकिन उसके जीवन में एक बात सबसे बड़ी थी—वह रिश्तों को दिल से निभाता था।

गोविंद का एक बड़ा भाई था, जो शहर में रहता था। समय के साथ भाई के पास धन, बड़ा घर और समाज में प्रतिष्ठा आ गई। गोविंद के पास न बड़ा मकान था, न बहुत पैसा, लेकिन उसके पास संतोष था।

एक दिन किसी छोटी-सी बात पर दोनों भाइयों में विवाद हो गया। बड़े भाई ने गुस्से में गोविंद से कहा,
“तुम्हारे पास है ही क्या? मेरी बराबरी करने की कोशिश मत करना।”

गोविंद की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसने कोई कठोर शब्द नहीं कहा। बस इतना बोला,
“भैया, रिश्ते मेरे लिए बहुत कीमती हैं, लेकिन अपना सम्मान खोकर कोई रिश्ता नहीं निभाया जा सकता।”

वह चुपचाप वहाँ से चला आया।

रास्ते में उसका मित्र मिला। उसने पूछा,
“तुमने जवाब क्यों नहीं दिया? तुम्हारे पास भी तो बहुत कुछ कहने को था।”

गोविंद मुस्कुराया और बोला,
“जीभ और शब्द सबके पास होते हैं। जो केवल अपने लिए जीते हैं, वे हर बात कह देते हैं; लेकिन जो अपनों के लिए जीते हैं, वे बहुत कुछ सह लेते हैं।”

कुछ वर्ष बीत गए।

कुछ समय के बाद बड़े भाई का व्यापार बुरी तरह डूब गया। जिन लोगों को वह अपना समझता था, वे एक-एक करके उससे दूर हो गए। समय ने ऐसा खेल पलटा कि सब कुछ उससे छिन गया !

वह छोटे भाई गोविंद के पास पहुँचा और बोला,
“भाई, मैंने तुम्हें बहुत दुख दिया है , क्या तुम मुझे माफ करोगे?”

गोविंद ने बड़े भाई को गले लगा लिया।

उसने कहा,
“रिश्ते टूटने नहीं चाहिए, लेकिन रिश्तों में सम्मान भी बचा रहना चाहिए। मैं तुम्हें कभी अपना दुश्मन मान ही नहीं पाया।”

बड़ा भाई रो पड़ा।

गोविंद ने उसे समझाते हुए कहा,
“भैया, यह जीवन बहुत छोटा है। यहाँ किसी के होने या न होने से आखिर कब तक फर्क पड़ेगा? हम सब मिट्टी से बने हैं और एक दिन इसी मिट्टी में मिल जाना है। हम इस दुनिया में मुसाफिर हैं। आज मंच सजा है, कल पर्दा गिर जाएगा।”

फिर उसने अपने भाई से कहा,
“इसलिए बीते हुए कल का पछतावा मत करो। पछतावा अतीत नहीं बदल सकता और चिंता भविष्य नहीं सँवार सकती। जो हमारे पास आज है, उसी में खुश रहना सीखो।”

भाई ने पूछा,
“फिर सच्ची दौलत क्या है?”

गोविंद मुस्कुराया और बोला,
“जिसके भीतर संतोष है, वही सबसे धनी है। जिसके भीतर शांति है, वही सबसे सुखी है। और जिसके भीतर दया है, वही सबसे श्रेष्ठ है।”

कुछ दिन बाद दोनों भाई गाँव में साथ रहने लगे। अब उनके पास पहले जैसी संपत्ति नहीं थी, लेकिन उनके घर में हँसी थी, प्रेम था और सुकून था।

गोविंद अक्सर गाँव के लोगों से कहा करता था—

“रिश्ते बचाइए, लेकिन आत्मसम्मान खोकर नहीं।
वर्तमान में जीइए, क्योंकि साँसों का कोई भरोसा नहीं।
दूसरों के लिए दया रखिए, क्योंकि अंत में धन नहीं, आपके कर्म आपके साथ चलेंगे।”

और सच यही है—

महल छूट सकते हैं, रिश्ते बदल सकते हैं, लोग दूर जा सकते हैं, समय हाथ से निकल सकता है; लेकिन जिसने अपने भीतर संतोष, शांति, दया और आत्मसम्मान बचाकर रखा, उसने जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति बचा ली।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार       !

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