उत्तर प्रदेश के लखनऊ में रामू एक बहुत होशियार और समझदार आदमी था। उसमें मेहनत करने की क्षमता भी थी, लेकिन उसकी सबसे बड़ी कमजोरी थी—आलस्य। वह हर काम को कल पर टाल देता। सुबह देर तक सोना, काम के समय आराम करना और जरूरी कामों को टालते रहना उसकी आदत बन चुकी थी।
उसकी पत्नी चंदा अक्सर समझाती, “रामू, तुम्हारे अंदर काबिलियत की कोई कमी नहीं है, कमी सिर्फ इतनी है कि तुम समय की कीमत नहीं समझते। याद रखना, जिंदगी में अवसर बार-बार दरवाजा नहीं खटखटाते।”
रामू हर बार हंसकर बात टाल देता।
एक दिन दोनों में इसी बात को लेकर झगड़ा हो गया। गुस्से में रामू बोला, “बस! अब मैं दूसरे शहर जाऊंगा, खूब मेहनत करूंगा और इतना बड़ा आदमी बनूंगा कि लोग मेरा उदाहरण देंगे।”
चंदा ने कहा, “बड़ा बनने की बात कहना आसान है रामू, लेकिन उसके लिए रोज खुद से लड़ना पड़ता है।”
रामू उसी दिन बैग उठाकर दूसरे शहर जाने के लिए स्टेशन पहुंच गया। उसने टिकट लिया और ट्रेन का इंतजार करने लगा। तभी सामने गर्मागर्म पूरी-छोले दिखाई दिए। रामू ने भरपेट खाना खाया और सोचा, “ट्रेन आने में अभी समय है, थोड़ी देर आराम कर लेता हूं।”
बस, यही उसकी पुरानी आदत थी—‘थोड़ी देर’।
रामू वहीं सो गया। ट्रेन आई और चली गई, लेकिन रामू को खबर तक नहीं हुई।
उसी समय मनकू काका वहां से गुजरे। उन्होंने रामू को देखा और चंदा को खबर कर दी। चंदा दौड़ती हुई स्टेशन पहुंची और रामू को जगाते हुए बोली, “उठो रामू! तुम्हारी ट्रेन चली गई।”
रामू ने आंखें मलते हुए पूछा, “क्या ट्रेन आ गई थी?”
मनकू काका मुस्कुराए और बोले, “रामू, तुम्हारी ट्रेन ही नहीं गई, तुम्हारी जिंदगी की कितनी ट्रेनें ऐसे ही निकल चुकी हैं।”
रामू चुप हो गया।
काका ने कहा, “बेटा, आलस्य कोई बड़ा रोग नहीं दिखाई देता , लेकिन धीरे-धीरे यह इंसान के सपनों को खा जाता है। एक काम आज से कल, कल से परसों और परसों से अगले महीने तक टलता रहता है। फिर एक दिन इंसान पीछे मुड़कर देखता है तो समझ आता है कि समय तो चला गया, लेकिन हम वहीं खड़े रह गए।”
रामू की आंखें झुक गईं।
उसने कहा, “काका, मैं बदलना चाहता हूं, लेकिन जब मौका आता है तो आलस मुझे रोक देता है।”
काका बोले, “बदलने के लिए किसी बड़े चमत्कार की जरूरत नहीं। छोटी-छोटी आदतें बदलो। रोज समय पर उठो। जो काम जरूरी है, उसे तुरंत करो। पांच मिनट का काम पांच दिन मत टालो। अपने आप से रोज एक छोटा वादा करो और उसे हर हाल में पूरा करो।”
रामू ने उसी दिन फैसला किया कि अब वह अपनी जिंदगी को “कल” के भरोसे नहीं छोड़ेगा।
अगले दिन उसने सुबह जल्दी उठकर पहला काम पूरा किया। फिर दूसरा। शुरुआत छोटी थी, लेकिन उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा। कुछ महीनों बाद वह मेहनत करने लगा। धीरे-धीरे उसने काम सीखा, पैसे बचाए और अपनी छोटी-सी दुकान शुरू कर दी।
कई वर्षों बाद उसकी दुकान बड़ी हो गई। लोग उससे सलाह लेने आने लगे।
एक दिन चंदा ने मुस्कुराकर पूछा, “रामू, आखिर तुम्हारे जीवन में इतना बड़ा बदलाव कैसे आया?”
रामू मुस्कुराया और बोला, “मेरी जिंदगी किसी बड़ी सीख से नहीं, एक छोटी-सी बात से बदली थी—काम को कल पर मत छोड़ो।”
मनकू काका की बात उसे आज भी याद थी—
“अवसर ट्रेन की तरह होते हैं, रामू…
जो समय पर नहीं चढ़ता, वह प्लेटफॉर्म पर खड़ा होकर सिर्फ धुआं देखता रह जाता है।”
जिंदगी बदलने के लिए हमेशा बड़ा कदम जरूरी नहीं होता।
कभी-कभी समय पर उठाया गया एक छोटा कदम ही पूरी जिंदगी बदल देता है।
आलस्य कहता है—“कल कर लेना।”
सफलता कहती है—“अभी शुरू करो।”
इसलिए अपने सपनों को सिर्फ सोचिए मत, उनके लिए आज ही पहला कदम उठाइए।
क्योंकि “कल” कभी आता नहीं, और “आज” दोबारा लौटकर नहीं आता।
- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
