राघव स्वभाव से बहुत तेज़-तर्रार आदमी था। छोटी-सी बात पर गुस्सा करना और बिना पूरी बात जाने किसी को दोषी ठहरा देना उसकी आदत बन चुकी थी।
एक दिन उसका पुराना मित्र नरेश कई वर्षों बाद उससे मिलने आया। दोनों ने साथ चाय पी और पुरानी यादें ताज़ा कीं। बातचीत के दौरान नरेश ने कहा,
“राघव, तुम अब भी पहले जैसे ही गुस्सैल हो?”
राघव हँसते हुए बोला, “क्या करूँ दोस्त, गलत बात देखकर चुप नहीं रह सकता।”
नरेश ने मुस्कुराकर कहा, “कभी-कभी गलत बात दिखाई देती है, लेकिन सच कुछ और होता है।”
राघव उसकी बात समझ नहीं पाया।
कुछ महीनों बाद राघव की बेटी की शादी तय हुई। शादी की तैयारियों की पूरी जिम्मेदारी उसके छोटे भाई समान मित्र मोहन ने अपने ऊपर ले ली। मोहन ने वादा किया कि वह शादी के दिन सुबह सबसे पहले विवाह स्थल पर पहुँच जाएगा।
शादी वाले दिन सुबह से ही घर में चहल-पहल थी। मेहमान आने लगे, रस्में शुरू हो गईं, लेकिन मोहन कहीं दिखाई नहीं दिया।
राघव का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया।
वह बोला,
“जिसे इतनी बड़ी जिम्मेदारी दी, वही आज गायब है! ऐसे दोस्त से तो दुश्मन अच्छा।”
परिवार वालों ने उसे शांत करने की कोशिश की, लेकिन वह किसी की सुनने को तैयार नहीं था।
शाम को बेटी के रिसेप्शन की तैयारियाँ चल रही थीं। तभी एक आदमी मोहन की ओर से एक सुंदर साड़ी, ₹501 का शगुन और शुभकामना पत्र लेकर आया।
राघव ने बिना पढ़े पत्र फाड़ दिया और गुस्से में बोला,
“जाकर कह देना, अब हमें उसकी किसी औपचारिकता की जरूरत नहीं है।”
रात बीत गई। शादी भी संपन्न हो गई।
करीब दस दिन बाद राघव की बेटी ने कहा,
“पिताजी, मोहन चाचा हमारे लिए परिवार जैसे हैं। वे शादी में नहीं आए तो जरूर कोई मजबूरी रही होगी। हमें उनके घर जाकर मिलना चाहिए।”
राघव मन ही मन नाराज़ था, फिर भी बेटी के साथ मोहन के घर चला गया।
दरवाज़ा खुला था। घर में अजीब-सी खामोशी थी। मोहन की पत्नी सुशीला रसोई से बाहर आईं। उन्होंने बेटी को गले लगाया और आशीर्वाद दिया।
राघव ने देखा कि उनकी आँखें लाल थीं और चेहरा बेहद थका हुआ था।
उसकी पत्नी ने धीरे से सुशीला का हाथ पकड़कर पूछा,
“बहन, सच बताइए… बात क्या है? आप कुछ छिपा रही हैं।”
इतना सुनते ही सुशीला फूट-फूटकर रोने लगीं।
उन्होंने कांपती आवाज़ में कहा,
“भैया… जिस दिन आपकी बेटी की शादी थी, उसी सुबह मोहन को अचानक दिल का दौरा पड़ा था। डॉक्टर के आने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई।”
राघव के पैरों तले जमीन खिसक गई।
सुशीला ने आगे कहा,
“मोहन आखिरी समय तक आपकी बेटी की शादी की चिंता कर रहे थे। उनकी इच्छा थी कि शादी में कोई बाधा न आए। इसलिए मैंने उनकी मृत्यु की खबर किसी को नहीं दी। मैं नहीं चाहती थी कि मेरी वजह से आपकी बेटी की शादी का माहौल दुख में बदल जाए।”
राघव की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसे याद आया—वह पत्र जो उसने गुस्से में फाड़ दिया था, वह साड़ी जिसे उसने ठुकरा दिया था और वे कठोर शब्द, जो उसने बिना सच जाने कहे थे।
वह सिर झुकाकर बोला,
“बहन, मैंने मोहन को नहीं समझा… मैंने सिर्फ सिक्के का एक पहलू देखा था।”
सुशीला ने आँसू पोंछते हुए कहा,
“भैया, इंसान की कहानी तब तक पूरी नहीं होती, जब तक उसका दूसरा पहलू न जान लिया जाए।”
उस दिन राघव हमेशा के लिए बदल गया।
हम अक्सर किसी के व्यवहार को देखकर तुरंत फैसला सुना देते हैं, लेकिन हमें यह नहीं पता होता कि वह व्यक्ति भीतर से किस दर्द या मजबूरी से गुजर रहा है।
किसी के बारे में राय बनाने से पहले उसकी परिस्थिति को समझिए।
क्योंकि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, और हर इंसान की कहानी का भी।
अधूरी जानकारी पर लिया गया फैसला अक्सर रिश्ते तोड़ देता है, जबकि थोड़ी समझदारी वही रिश्ता बचा सकती है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
