” संभलकर चलिए “

नदी के शांत किनारे पर एक वृद्ध साधु प्रतिदिन की तरह एक पेड़ के नीचे बैठे हुए थे। शाम धीरे-धीरे ढल रही थी। सूर्य की लालिमा नदी के पानी पर सुनहरी चादर-सी बिछा रही थी। तभी एक भिक्षु तेज कदमों से वहां आया और साधु के पास रुककर बोला, “बाबा, यहां से नगर कितनी दूर है? मैंने सुना है कि सूर्यास्त होते ही नगर का द्वार बंद कर दिया जाता है। मुझे आज रात नगर में ही रुकना है। क्या मैं समय पर वहां पहुंच जाऊंगा?”

वृद्ध साधु ने शांत भाव से उसकी ओर देखा और मुस्कुराकर कहा, “यदि धीरे चलोगे, तो पहुंच भी सकते हो।”

भिक्षु यह सुनकर हैरान रह गया। उसने सोचा, “नगर का द्वार बंद होने वाला है और बाबा मुझे धीरे चलने के लिए कह रहे हैं! मंजिल जल्दी पानी हो तो तेज चलना चाहिए।”

बिना कुछ और पूछे वह तेजी से नगर की ओर दौड़ पड़ा।

कुछ दूर जाने के बाद रास्ता कठिन हो गया। कहीं बड़े-बड़े पत्थर थे, तो कहीं जमीन ऊबड़-खाबड़ थी। भिक्षु ने अपनी गति कम नहीं की। वह लगातार दौड़ता रहा। अचानक उसका पैर एक पत्थर से टकराया और वह बुरी तरह गिर पड़ा।

उसके घुटने और पैर में चोट लग गई। कुछ देर तक वह दर्द से वहीं पड़ा रहा। बड़ी मुश्किल से उठा और लंगड़ाते हुए आगे बढ़ने लगा।

अब उसकी गति पहले से भी कम हो चुकी थी।

वह बार-बार पीछे मुड़कर देखता और सोचता, “काश! मैंने उस वृद्ध की बात समझी होती।”

जब वह नगर के पास पहुंचा, तब तक अंधेरा गहरा चुका था। सामने नगर का विशाल द्वार धीरे-धीरे बंद हो रहा था। भिक्षु ने पूरी ताकत लगाकर आगे बढ़ने की कोशिश की, लेकिन चोट के कारण वह समय पर नहीं पहुंच सका।

उसी समय वहां से एक व्यक्ति गुजर रहा था। उसने भिक्षु की हालत देखी और मुस्कुराने लगा।

भिक्षु ने नाराज होकर पूछा, “मेरी परेशानी देखकर हंस क्यों रहे हो?”

उस व्यक्ति ने कहा, “मैं आपकी परेशानी पर नहीं, आपकी भूल पर मुस्कुरा रहा हूं। कुछ वर्ष पहले मेरे साथ भी बिल्कुल यही हुआ था। मैं भी उसी वृद्ध साधु के पास गया था और उन्होंने मुझसे कहा था—‘धीरे चलो तो पहुंच जाओगे।’ मैंने भी आपकी तरह उनकी बात नहीं समझी और तेजी से दौड़ पड़ा था। रास्ते में गिरा, घायल हुआ और नगर का द्वार मेरे सामने बंद हो गया।”

भिक्षु ने आश्चर्य से पूछा, “लेकिन बाबा ने ऐसा क्यों कहा था?”

व्यक्ति ने उत्तर दिया, “क्योंकि बाबा जानते थे कि नगर तक जाने वाला रास्ता कठिन और पथरीला है। उनका मतलब यह था कि जल्दबाजी मत करना, संभलकर चलना। यह समझ लो यदि कदम सोच-समझकर रखोगे तो बिना घायल हुए समय पर पहुंच जाओगे।”

भिक्षु कुछ देर मौन खड़ा रहा। उसे उस दिन समझ आया कि हर सलाह का अर्थ केवल शब्दों से नहीं, उसके पीछे छिपे अनुभव से समझना चाहिए।

 

जीवन में केवल तेज दौड़ना ही सफलता की निशानी नहीं है। कई बार जल्दबाजी हमें मंजिल के करीब ले जाने के बजाय रास्ते में ही गिरा देती है। सही दिशा, धैर्य और सावधानी के साथ उठाया गया छोटा कदम भी हमें सुरक्षित रूप से मंजिल तक पहुंचा सकता है।

जिंदगी की दौड़ में रफ्तार से ज्यादा जरूरी है सही कदम।
धीरे चलिए, संभलकर चलिए और अपनी मंजिल तक सुरक्षित पहुँचिये !

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार       !

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