काशी की एक संकरी गली थी। चारों ओर पुराने मकान, छोटी-छोटी दुकानें और मंदिरों की घंटियों की मधुर ध्वनि वातावरण को आध्यात्मिक बना रही थी। उन्हीं गलियों से एक दिन स्वामी विवेकानंद जी गुजर रहे थे। वे अपने विचारों में खोए हुए आगे बढ़ रहे थे कि अचानक उनके सामने बंदरों का एक बड़ा झुंड आ गया।
बंदरों ने उन्हें देखते ही शोर मचाना शुरू कर दिया और उनकी ओर बढ़ने लगे। स्वामी जी ने पहले उन्हें अनदेखा किया, लेकिन जब बंदर उनके बहुत करीब आ गए तो वे उनसे बचने के लिए पीछे की ओर चलने लगे। जैसे-जैसे वे पीछे हटते गए, बंदर और अधिक आक्रामक होते गए।
कुछ ही क्षणों में बंदरों ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। किसी ने उनके वस्त्र खींचे, किसी ने खरोंच मारी और एक-दो बंदरों ने काटने का प्रयास भी किया। स्वामी जी परेशान होकर तेजी से पीछे हटने लगे।
तभी पास के एक मकान की खिड़की से एक व्यक्ति ने यह दृश्य देखा। उसने जोर से आवाज लगाई—
“स्वामी जी! भागिए मत… रुक जाइए! उनका सामना कीजिए। पीछे मत हटिए। दृढ़ होकर आगे बढ़िए।”
स्वामी जी के कदम अचानक रुक गए।
उन्होंने स्वयं को संभाला। चेहरे पर दृढ़ता आई। उन्होंने मुट्ठी बाँधी और बंदरों की ओर देखकर आगे बढ़ना शुरू कर दिया।
अचरज की बात यह हुई कि जो बंदर कुछ क्षण पहले उन्हें डराने के लिए दौड़ रहे थे, वे अब स्वयं पीछे हटने लगे। स्वामी जी एक कदम आगे बढ़ते और बंदर एक कदम पीछे हटते। कुछ ही क्षणों में पूरा झुंड इधर-उधर भाग गया।
स्वामी जी ने बिना किसी भय के उस गली को पार कर लिया।
बाद में जब वे अपने शिष्यों और मित्रों को यह घटना सुनाते, तो कहते—
“जीवन में आने वाली समस्याएँ भी इन बंदरों जैसी होती हैं। जब हम उनसे डरकर भागते हैं, तो वे हमारा पीछा करती हैं। लेकिन जिस दिन हम रुककर उनका सामना करना सीख लेते हैं, उसी दिन समस्याएँ पीछे हटने लगती हैं।”
यह बात हमारे जीवन पर भी बिल्कुल लागू होती है।
कभी आर्थिक परेशानी हमारे सामने खड़ी होती है, कभी असफलता, कभी अपमान, कभी रिश्तों में आई दूरी और कभी भविष्य की चिंता। हम अक्सर समस्या का समाधान खोजने के बजाय उससे बचने लगते हैं। लेकिन समस्या से भागने पर वह समाप्त नहीं होती, बल्कि हमारे मन में और बड़ी होती जाती है।
मान लीजिए किसी विद्यार्थी को परीक्षा में असफलता मिलती है। यदि वह पढ़ाई छोड़कर भाग जाए, तो असफलता उसका पीछा करती रहेगी। लेकिन यदि वह अपनी गलती पहचाने, मेहनत करे और दोबारा प्रयास करे, तो वही असफलता उसकी सफलता की सीढ़ी बन सकती है।
इसी तरह यदि किसी व्यक्ति के सामने आर्थिक संकट है, तो घबराने के बजाय उसे अपनी परिस्थितियों को समझना चाहिए, अनावश्यक खर्च कम करने चाहिए, आय बढ़ाने के रास्ते खोजने चाहिए और धैर्य के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
याद रखिए—
समस्या से भागना समाधान नहीं है।
समस्या का सामना करना ही समाधान की पहली सीढ़ी है।
जब जीवन आपको डराए, तो पीछे मत हटिए। अपने भीतर के साहस को जगाइए, अपनी मुट्ठियाँ बाँधिए और दृढ़ होकर कहिए—
“मैं समस्या से बड़ा हूँ।
मैं हार नहीं मानूँगा।
मैं इसका सामना करूँगा और आगे बढ़ूँगा।”
क्योंकि अक्सर हमारी सबसे बड़ी जीत उसी क्षण शुरू होती है, जब हम डरकर भागना बंद कर देते हैं।
जीवन में समस्या रूपी बंदर आते रहेंगे,
लेकिन जो व्यक्ति डटकर उनका सामना करता है,
वही अंततः अपनी मंजिल तक पहुँचता है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
