महाभारत काल की बात है। हस्तिनापुर के समीप महर्षि धौम्य का एक प्रसिद्ध आश्रम था। वहाँ अनेक राजकुमार और ब्रह्मचारी शिक्षा प्राप्त करते थे। महर्षि केवल वेद और शस्त्र ही नहीं, बल्कि धर्म, दया और त्याग का भी ज्ञान देते थे।
उनके दो शिष्य थे—सत्यकेतु और लोभित। सत्यकेतु सरल, दयालु और संतोषी था, जबकि लोभित बुद्धिमान तो था, लेकिन धन और वैभव का अत्यधिक लालची था।
एक दिन महर्षि धौम्य ने दोनों को अपने पास बुलाया और कहा, “हिमालय की तलहटी में मेरे परम मित्र महर्षि लोमश का आश्रम है। तुम दोनों वहाँ जाकर उनका कुशल समाचार लेकर आओ।”
महर्षि ने दोनों को एक-एक थैला दिया। सत्यकेतु का थैला अन्न, फल, औषधियों और वस्त्रों से भरा था, जबकि लोभित का थैला खाली था।
महर्षि ने सत्यकेतु से कहा, “वत्स! मार्ग में जो भी भूखा, प्यासा, रोगी या असहाय मिले, उसे इस थैले का सामान दे देना।”
फिर लोभित से बोले, “और तुम मार्ग में जो भी मूल्यवान वस्तु मिले, उसे अपने थैले में रख लेना।”
दोनों यात्रा पर निकल पड़े।
सत्यकेतु जहाँ भी किसी दुखी व्यक्ति को देखता, प्रेम से उसकी सहायता करता। कहीं किसी वृद्ध ऋषि को फल दे देता, कहीं किसी भूखे बालक को अन्न खिला देता, तो कहीं किसी घायल यात्री को औषधि दे देता। धीरे-धीरे उसका थैला हल्का होता गया, लेकिन उसका मन आनंद और संतोष से भरता गया।
उधर लोभित को मार्ग में ताँबे के सिक्के मिले, फिर चाँदी के आभूषण मिले। आगे बढ़ा तो एक परित्यक्त गुफा में उसे स्वर्ण मुद्राएँ और सोने की ईंटें दिखाई दीं। उसने बिना सोचे-समझे सब अपने थैले में भर लिए।
अब उसका थैला इतना भारी हो गया कि वह मुश्किल से चल पा रहा था। फिर भी लालच ने उसे रुकने नहीं दिया। वह सोचता रहा—”इतना धन लेकर लौटूँगा तो मेरा जीवन बदल जाएगा।”
कुछ ही दूर चलने पर उसका शरीर थक गया। पसीने से लथपथ होकर वह गिर पड़ा और बेहोश हो गया। जंगल में जंगली पशु उसके आसपास घूमने लगे।
जब सत्यकेतु लौट रहा था, तब उसने अपने साथी को अचेत अवस्था में देखा। उसने बिना देर किए उसका भारी थैला एक ओर रखा, उसे पानी पिलाया, औषधि दी और कंधे का सहारा देकर आश्रम तक ले आया।
दोनों जब महर्षि धौम्य के सामने पहुँचे, तो लोभित लज्जा से सिर झुकाए खड़ा था।
महर्षि मुस्कराए और बोले, “वत्स! यह संसार भी एक यात्रा है। जो केवल धन, स्वर्ण और वस्तुओं का संग्रह करता है, उसका जीवन उसी बोझ से दब जाता है। पर जो दूसरों का दुःख बाँटता है, उसका अपना बोझ स्वयं हल्का हो जाता है।”
उन्होंने आगे कहा, “महाभारत का धर्म भी यही सिखाता है कि मनुष्य का सबसे बड़ा धन उसका त्याग, सेवा और करुणा है। सोने की ईंटें कभी किसी को महान नहीं बनातीं, लेकिन एक रोटी का दान भी मनुष्य को अमर बना देता है।”
उस दिन लोभित की आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले। उसने स्वर्ण का मोह त्याग दिया और जीवनभर धर्म, सेवा और दान के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
धन का संग्रह मनुष्य को भारी बनाता है, लेकिन दया, सेवा और दान जीवन को हल्का, पवित्र और सुखी बना देते हैं। यही महाभारत का सच्चा धर्म है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
