” एक अनोखे मालिक की बहुत बड़ी सीख “

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे बछरावां में राम रतन तिवारी नाम के एक सम्मानित और उदार स्वभाव के व्यक्ति रहते थे। उनके घर में कई लोग काम करते थे। सभी उनका बहुत सम्मान करते थे, क्योंकि वे कभी किसी से ऊँची आवाज़ में बात नहीं करते थे। उनका मानना था कि इंसान को आदेश से नहीं, बल्कि प्रेम और सम्मान से जीता जा सकता है।

उनके घर में एक अधेड़ उम्र का नौकर भी था। वह मेहनती तो था, लेकिन उसकी एक आदत सबको परेशान करती थी। वह रोज़ देर तक सोता रहता था। जब तक वह उठता, घर के बाकी लोग अपना-अपना काम शुरू कर चुके होते। कई बार उसे समझाया गया, लेकिन उसकी आदत नहीं बदली।

घर के लोगों ने एक दिन राम रतन तिवारी से कहा, “मालिक, इसे कई बार समझा चुके हैं। अब इसे काम से निकाल दीजिए।”

श्री तिवारी मुस्कराए और बोले, “हर गलती की सज़ा निकाल देना नहीं होती। कभी-कभी प्यार से समझाने का असर डाँट से कहीं ज़्यादा होता है।”

अगली सुबह सूरज निकलने से पहले ही राम रतन तिवारी उठ गए। उन्होंने एक लोटे में पानी भरा और धीरे-धीरे उस नौकर के कमरे में पहुँचे। नौकर गहरी नींद में सो रहा था।

उन्होंने बड़े स्नेह से उसके कंधे पर हाथ रखा और बोले, “उठिए मालिक… सुबह हो गई है। पहले मुँह-हाथ धो लीजिए। मैं आपके लिए चाय और नहाने का पानी तैयार करता हूँ।”

यह सुनकर नौकर घबरा गया। उसे लगा शायद वह कोई सपना देख रहा है। वह कुछ समझ पाता, उससे पहले राम रतन तिवारी सचमुच गर्म चाय लेकर उसके सामने खड़े थे।

वे मुस्कराकर बोले, “लीजिए मालिक, पहले चाय पी लीजिए। फिर आराम से अपने काम पर लगिए।”

अब नौकर की आँखों से आँसू निकल पड़े। वह उनके चरणों में झुक गया और बोला, “मालिक, आपने मुझे नौकर नहीं, इंसान समझकर सम्मान दिया है। आज आपने मुझे मेरी सबसे बड़ी भूल का एहसास करा दिया। मैं वचन देता हूँ कि आज के बाद कभी देर तक नहीं सोऊँगा और अपने कर्तव्य में लापरवाही नहीं करूँगा।”

अगले ही दिन घर के सभी लोग हैरान रह गए। वही नौकर सबसे पहले उठ चुका था। उसने आँगन साफ़ कर दिया था, चाय बना दी थी और घर का अधिकांश काम भी पूरा कर लिया था। उसकी आदत हमेशा के लिए बदल चुकी थी।

घर वालों ने राम रतन तिवारी से पूछा, “आपने ऐसा कौन-सा जादू कर दिया?”

वे मुस्कराकर बोले, “जादू मैंने नहीं किया। यह सम्मान और विनम्रता की शक्ति है। इंसान को अपमान से नहीं, सम्मान से बदला जा सकता है। जब हम किसी को उसकी इज़्ज़त का एहसास कराते हैं, तब उसका हृदय स्वयं बदल जाता है।”

उस दिन घर के सभी लोगों ने समझ लिया कि सच्चा नेतृत्व वही है, जिसमें अधिकार से अधिक विनम्रता और प्रेम हो। कठोर शब्द जहाँ दीवारें खड़ी करते हैं, वहीं मधुर व्यवहार दिलों के दरवाज़े खोल देता है।

विनम्रता सबसे बड़ी ताकत है। सम्मान देकर हम वह परिवर्तन ला सकते हैं, जो डाँट और दंड कभी नहीं ला सकते।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार      !

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