*एक रिश्ता, जिसे समय और पद भी नहीं बदल सके*
बहुत समय पहले की बात है। एक जिले में नए जिलाधिकारी की नियुक्ति हुई। वे साधारण परिवार से निकलकर अपनी मेहनत और लगन के बल पर इस ऊँचे पद तक पहुँचे थे। उन्हें गरीबों का दर्द अच्छी तरह समझ आता था। नियुक्ति के पहले ही दिन वे शहर का निरीक्षण करने निकल पड़े।
उनका काफिला विश्वविद्यालय मार्ग से गुजर रहा था। सड़क के किनारे छोटी-छोटी दुकानें, चाय की गुमटियाँ और ठेले लगे रहते थे। जिलाधिकारी के आने की सूचना मिलते ही पुलिस ने दुकानदारों और रिक्शा चालकों को हटाना शुरू कर दिया। कोई अपनी टोकरी समेट रहा था, तो कोई अपना ठेला खींचकर दूसरी जगह ले जा रहा था।
जिलाधिकारी गाड़ी में बैठे यह सब देख रहे थे। उनके मन में विचार आया, “जिस गरीब को दो वक्त की रोटी कमाने के लिए दिनभर धूप में खड़ा रहना पड़ता है, उसी की रोजी-रोटी हम कुछ मिनटों के लिए छीन लेते हैं। क्या यही व्यवस्था है?”
अचानक उनकी नजर सड़क के किनारे पड़ी एक पुरानी कढ़ाई और समोसे बनाने के सामान पर पड़ी। वे तुरंत गाड़ी से उतरे और उस ओर बढ़ गए।
एक वृद्ध दुकानदार उन्हें देखकर घबरा गया। वह हाथ जोड़कर बोला, “साहब, मुझसे गलती हो गई। अभी अपना सामान हटा लेता हूँ। मुझे माफ कर दीजिए।”
तभी जिलाधिकारी की आँखें नम हो गईं। उन्होंने भावुक होकर कहा, “काका!”
वृद्ध चौंक गया। शहर में सभी उसे चाचा कहते थे, लेकिन इतने वर्षों बाद किसी ने उसे काका कहकर पुकारा था।
जिलाधिकारी फिर बोले, “काका, मुझे पहचाना नहीं? मैं वही लड़का हूँ, जो वर्षों पहले गाँव से यहाँ पढ़ने आया था। जिसके पास कई बार भोजन के पैसे भी नहीं होते थे। आप ही तो थे, जो मुझे अपने हाथों से समोसे खिलाया करते थे।”
यह सुनते ही वृद्ध की आँखों से आँसू बहने लगे। उसे सब कुछ याद आने लगा।
वर्षों पहले एक गरीब लड़का शहर में पढ़ने आया था। उसके सिर पर माँ का साया नहीं था और जेब में पैसे भी बहुत कम होते थे। वह अक्सर शाम को काका की छोटी-सी दुकान पर आता और समोसे खाता। पैसे न होने पर काका उससे कभी हिसाब नहीं माँगते थे।
लड़का मुस्कुराकर कहता, “काका, आज उधार लिख लो। एक दिन बड़ा आदमी बनूँगा और आपका सारा कर्ज ब्याज सहित लौटाऊँगा।”
काका हँसकर कहते, “बेटा, मुझे पैसे नहीं चाहिए। बस खूब पढ़-लिखकर अच्छा इंसान बनना।”
समय बीतता गया। लड़के ने कठिन परिश्रम किया, पढ़ाई पूरी की और एक दिन जिलाधिकारी बन गया। लेकिन व्यस्त जीवन में भी वह अपने काका और उनके समोसों को कभी नहीं भूला।
आज वर्षों बाद दोनों आमने-सामने थे। जिलाधिकारी ने काका को गले लगा लिया और कहा, “काका, आज आपका उधार चुकाने आया हूँ।”
काका ने उनके सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “बेटा, तुम्हारी सफलता ही मेरा सबसे बड़ा धन है। तुमने मुझे पहचान लिया, मेरे लिए यही सबसे बड़ा उपहार है।”
जिलाधिकारी ने अधिकारियों को समझाया कि गरीबों की आजीविका का सम्मान किया जाए और व्यवस्था बनाते समय उनकी समस्याओं का भी ध्यान रखा जाए।
इसके बाद वे काका को अपने साथ ले गए। उस दिन समोसों का उधार नहीं, बल्कि वर्षों पुराना प्रेम और अपनापन चुकाया गया था।
जीवन में कितना भी बड़ा पद क्यों न मिल जाए, उन लोगों को कभी मत भूलिए जिन्होंने कठिन समय में आपका साथ दिया था। धन और पद से व्यक्ति बड़ा बन सकता है, लेकिन सच्चे संस्कार, कृतज्ञता और दूसरों के प्रति सम्मान ही उसे महान बनाते हैं।
याद रखिए, किसी जरूरतमंद की छोटी-सी सहायता भी उसके जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकती है। इसलिए सामर्थ्य हो तो किसी की मदद अवश्य करें, क्योंकि आज आप किसी के लिए सहारा बनेंगे, तो कल आपकी अच्छाई किसी और के जीवन में प्रेरणा बनकर चमकेगी !
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
