” मदद “

शनिवार की रात लगभग साढ़े ग्यारह बजे जय कार्यालय से घर लौट रहा था। कुछ दूर जाने पर उसे सड़क किनारे एक युवती दिखाई दी, जो हाथ देकर किसी वाहन को रोकने का प्रयास कर रही थी। जय ने समझा कि वह उससे सहायता माँग रही है, इसलिए उसने अपनी मोटरसाइकिल रोक दी। तभी एक तिपहिया वाहन वहाँ से निकल गया।

युवती क्रोधित होकर बोली, “मैंने उस वाहन को रोका था। बड़ी मुश्किल से वह आया था, लेकिन आपकी वजह से वह भी निकल गया!”

जय को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने तुरंत क्षमा माँगी और उसे घर तक छोड़ने की बात कही, लेकिन युवती ने मना कर दिया।

रात गहराती जा रही थी। सड़क सुनसान थी और आसपास कोई दिखाई नहीं दे रहा था। जय चाहता तो वहाँ से चला जाता, लेकिन उसका मन उसे ऐसा करने की अनुमति नहीं दे रहा था।

उसने सोचा, “यदि इस समय इस युवती के साथ कोई अनहोनी हो गई, तो क्या मैं स्वयं को कभी क्षमा कर पाऊँगा?”

वह लगभग आधे घंटे तक वहीं खड़ा रहा। फिर उसने युवती से कहा, “मेरे घर में भी तुम्हारे जैसी एक छोटी बहन है। मैं तुम्हें उसी की तरह समझकर सहायता करना चाहता हूँ। कृपया मेरी बात मान लो।”

युवती कुछ शांत हुई, लेकिन फिर भी झिझक रही थी।

तब जय ने अपना बटुआ निकालकर कहा, “इसमें मेरा पहचान पत्र और वाहन चलाने का अनुज्ञापत्र है। तुम इन्हें अपने पास रख लो। मैं तुम्हें सुरक्षित स्थान तक छोड़ दूँगा। वहाँ पहुँचकर इन्हें लौटा देना।”

युवती ने पहचान पत्र देखा। उस पर जय का नाम लिखा था। आखिरकार उसे विश्वास हुआ और वह मोटरसाइकिल पर बैठ गई।

लगभग चालीस किलोमीटर चलने के बाद युवती ने एक स्थान पर रुकने को कहा। वह तुरंत एक गली की ओर चली गई और कुछ ही क्षणों में आँखों से ओझल हो गई।

जय को संतोष था कि वह युवती सुरक्षित अपने घर के निकट पहुँच गई होगी।

जब वह घर पहुँचा, तब रात के तीन बज चुके थे। पिता, माता और छोटी बहन उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। पिता ने उसे डाँटा, लेकिन जय बिना कुछ कहे अपने कमरे में चला गया।

अगली सुबह लगभग ग्यारह बजे छोटी बहन ने उसे जगाया।

“भैया, नीचे कोई लड़की अपने माता-पिता के साथ आई है। पिताजी तुम्हें बुला रहे हैं!”

जय नीचे पहुँचा तो सामने वही युवती खड़ी थी।

वह मुस्कुराकर बोली, “भैया, आश्चर्य हुआ न? आपके बटुए में रखे पहचान पत्र से आपका पता मिला। आपसे धन्यवाद कहे बिना मैं कैसे रह सकती थी? आपने मेरी सहायता की, जबकि मैंने आपके साथ ठीक से व्यवहार भी नहीं किया। इसके लिए क्षमा चाहती हूँ।”

उसके माता-पिता ने जय को हृदय से आशीर्वाद दिया और उसकी सहायता के लिए आभार व्यक्त किया।

यह देखकर जय के पिता की आँखें भर आईं। उन्होंने बेटे को गले लगाकर कहा, “मुझे तुम पर गर्व है, बेटा! तुमने आज सिद्ध कर दिया कि अच्छे संस्कार ही मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान हैं। रात को तुम्हारी चिंता में मैंने तुम्हें डाँट दिया, इसके लिए मुझे क्षमा करना।”

जय ने पिता को गले लगाते हुए कहा, “पिताजी, आप भी तो मेरी चिंता के कारण ही क्रोधित हुए थे।”

यह सुनते ही माता और छोटी बहन भी उससे लिपट गईं। उस घर में प्रेम, विश्वास और गर्व का सुंदर दृश्य था।

 

किसी की सहायता करना केवल उपकार नहीं, बल्कि मानवीय कर्तव्य है। सहायता करते समय दूसरे की सुरक्षा, सम्मान और इच्छा का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है।

याद रखिए—अकेली लड़की अवसर नहीं, बल्कि एक मनुष्य है, जिसके प्रति सम्मान, संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व का भाव रखना हमारा कर्तव्य है।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार        !

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