” त्याग के बीज “


बिरजू आज बहुत खुश था, क्योंकि उसकी वर्षों पुरानी ख्वाहिश पूरी होने वाली थी। बचपन से उसका सपना था कि एक दिन वह भी किसी हीरो की तरह अपनी बाइक पर घूमे। पढ़ाई के बाद वह दो शिफ्टों में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता और अपनी जेब खर्च में से पैसे बचाता। लगभग बारह महीनों में उसने दस हजार रुपये जोड़ लिए थे।

कुछ दिन पहले उसने अपने दोस्त राजू से कहा था कि दस हजार रुपये तक कोई अच्छी पुरानी बाइक मिल जाए तो बताना। कल ही राजू ने उसे एक बाइक के बारे में बताया था। बाइक उसके बजट में थी और बिरजू ने मन ही मन तय कर लिया था कि आज वह बाइक घर लाकर सबको चौंका देगा।

उसे याद आया कि उसने कभी अपने पिता से भी बाइक की इच्छा जताई थी। पिता ने तब समझाते हुए कहा था, “बेटा, तुम्हारी पढ़ाई करवा रहा हूँ, यही मेरी हैसियत है। महंगे शौक पूरे करने हैं तो खुद कमाना सीखो। तुम्हारी छोटी बहन गौरी की शादी भी करनी है।”

बिरजू उस समय मन मारकर रह गया था। उसे विश्वास था कि एक दिन पिता उसकी इच्छा जरूर पूरी करेंगे, लेकिन एक दुर्घटना में पिता इस दुनिया से चले गए। अब घर में मां सुषमा, छोटी बहन गौरी और बिरजू ही थे। मां आसपास के लोगों के कपड़े सिलती और बिरजू ट्यूशन पढ़ाकर घर चलाने में मदद करता था।

उस दिन ट्यूशन पढ़ाकर बिरजू घर से निकल ही रहा था कि उसने गौरी को उदास बैठे देखा।

“क्या हुआ गुड़िया? आज स्कूल नहीं गई?”

गौरी बोली, “भैया, रानी आज स्कूल नहीं आई। मैं उसके साथ साइकिल पर चली जाती हूँ। आज बस के लिए एक घंटे इंतजार किया, फिर वापस आ गई।”

बिरजू ने उसकी उदासी देखी और मुस्कुराते हुए कहा, “अच्छा, तो मेरी गुड़िया इसलिए उदास है? तू चिंता मत कर। आज जब तेरा भाई घर लौटेगा ना, तो बिल्कुल हीरो लगेगा।”

कुछ देर बाद बिरजू मिठाई का डिब्बा लेकर घर लौटा।

“गौरी! आ देख, आज मेरा सपना सच हो गया।”

गौरी ने उदास होकर कहा, “भैया, मेरा मन नहीं है।”

बिरजू ने मिठाई का डिब्बा और एक लिफाफा उसके हाथ में देते हुए कहा, “पहले इसे खोल तो सही।”

गौरी ने लिफाफा खोला तो उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

“मां… भैया मेरे लिए साइकिल लाए हैं!”

सुषमा जी भी हैरान रह गईं। “लेकिन बेटा, तू तो बाइक लेने वाला था?”

बिरजू मुस्कुराया, “हां मां, बाइक मेरा सपना है। लेकिन मेरी गुड़िया की पढ़ाई से बड़ा मेरा कोई सपना नहीं। बाइक फिर कभी ले लूंगा। आज जब इसे उदास देखा तो लगा जैसे किसी ने मेरा कलेजा निकाल लिया हो।”

कुछ पल रुककर वह बोला, “मां, साइकिल खरीदते समय अचानक पापा याद आ गए। तब समझ आया कि उन्होंने भी हमारे लिए न जाने कितने अपने सपने छोड़े होंगे। आज मुझे गौरी सिर्फ बहन नहीं, बेटी जैसी लगी।”

गौरी दौड़कर बिरजू के गले लग गई।

सुषमा जी ने दीवार पर टंगी पति की तस्वीर की ओर देखा और भावुक होकर बोलीं, “आप कहते थे ना, एक दिन हमारे त्याग का एहसास बिरजू को जरूर होगा। देखिए, आज आपके त्याग के बीज उसके भीतर दिखाई दे रहे हैं।”

उन्होंने दोनों बच्चों को सीने से लगा लिया।

 

त्याग के बीज भले ही दिखाई न दें, लेकिन जब वे प्रेम और संस्कारों से सींचे जाते हैं, तो एक दिन उनके भीतर से सुंदर रिश्तों के फूल जरूर खिलते हैं।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार        !

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