” शादी की सालगिरह मुबारक हो “

एक प्रेमी-युगल था। शादी से पहले दोनों के बीच खूब हँसी-मजाक, प्यार और नोक-झोंक हुआ करती थी। छोटी-छोटी बातों पर रूठना और फिर एक-दूसरे को मनाना उनकी जिंदगी का हिस्सा था।

लेकिन शादी के बाद धीरे-धीरे परिस्थितियाँ बदलने लगीं। अब वही छोटी-छोटी बातें बहस और झगड़े का कारण बनने लगीं। प्यार तो दोनों के दिल में था, लेकिन कभी-कभी अहंकार और नाराजगी उस प्यार पर भारी पड़ जाती थी।

एक दिन उनकी शादी की सालगिरह थी। पत्नी ने सोचा कि आज वह अपने पति को शुभकामना नहीं देगी। वह देखना चाहती थी कि क्या पति को उनकी सालगिरह याद है और वह खुद उसे शुभकामना देता है या नहीं।

सुबह पति जल्दी उठकर घर से बाहर चला गया।

पत्नी को बहुत बुरा लगा। उसने मन ही मन सोचा, “शायद उसे हमारी सालगिरह याद ही नहीं।”

करीब दो घंटे बाद अचानक दरवाजे की घंटी बजी।

पत्नी दौड़कर दरवाजा खोलने गई। सामने उसका पति खड़ा था। उसके हाथों में एक सुंदर-सा उपहार और केक था।

पति ने मुस्कुराते हुए पत्नी को गले लगाया और कहा,
“शादी की सालगिरह मुबारक हो!”

पत्नी कुछ कह पाती, उससे पहले पति सामान लेकर अपने कमरे में चला गया।

तभी अचानक पत्नी के फोन की घंटी बजी। फोन पुलिस थाने से था।

पुलिस अधिकारी ने कहा,
“क्या आप इस नंबर के मालिक को जानती हैं? हमें उनके पति का शव मिला है। उनकी जेब से मिले पर्स में आपका नंबर था, इसलिए आपको सूचना दी गई।”

पत्नी के पैरों तले जमीन खिसक गई।

वह कांपते हुए सोचने लगी—“लेकिन मेरे पति तो अभी घर के अंदर आए हैं!”

तभी उसे किसी से सुनी हुई एक बात याद आई—“कभी-कभी मृत व्यक्ति अपनी आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए अपने प्रियजन से मिलने आता है।”

यह सोचते ही वह फूट-फूटकर रोने लगी। उसे अपने पति के साथ बिताए सारे पल याद आने लगे—प्यार, हँसी, चूमना, रूठना, झगड़ना और छोटी-छोटी बातों पर नाराज होना।

उसे पछतावा होने लगा कि उसने आज सुबह भी प्यार से अपने पति से बात नहीं की।

वह रोते हुए कमरे में गई, लेकिन वहाँ उसका पति नहीं था।

वह चिल्लाकर कहने लगी,
“प्लीज वापस आ जाओ… अब मैं कभी तुमसे नहीं झगड़ूँगी। मुझे अकेला छोड़कर मत जाओ!”

तभी बाथरूम से उसका पति बाहर आया और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोला,
“क्या हुआ? तुम इतनी क्यों रो रही हो?”

पत्नी पलटी और पति को सामने देखकर उससे लिपट गई। रोते-रोते उसने पूरी बात बता दी।

पति मुस्कुराया और बोला,
“आज सुबह मेरा पर्स चोरी हो गया था। उसी में मेरा पहचान-पत्र और बाकी सामान था। मैं तुम्हारे लिए सालगिरह का उपहार लेना चाहता था, लेकिन पैसे नहीं थे। इसलिए मैंने अपने दोस्त की दुकान से केक और उपहार उधार लिए।”

पत्नी ने पति को और कसकर गले लगा लिया।

उस दिन दोनों को एक बहुत बड़ी सीख मिली—किसी अपने की कीमत उसके चले जाने के बाद समझने से बेहतर है कि उसके साथ रहते हुए ही उसे प्यार दिया जाए।

 

जिंदगी बहुत अनिश्चित है। अपनों से छोटी-मोटी नोक-झोंक होना स्वाभाविक है, लेकिन नाराजगी को इतना लंबा मत खींचिए कि कल उन्हें मनाने का अवसर ही न मिले।

जो आपके अपने हैं, उन्हें आज ही बता दीजिए कि वे आपके लिए कितने खास हैं।
क्योंकि जिंदगी हर रिश्ते को दूसरा मौका दे, यह जरूरी नहीं।

प्यार बाँटिए, मुस्कुराइए और अपनों के साथ खुश रहिए।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार         !

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