” सब्जी वाला “

एक लड़के और लड़की की शादी बड़े धूमधाम से हुई थी। पंडित जी ने कुंडली के पूरे 36 गुण मिलाए थे और दोनों परिवारों ने खुशी-खुशी शादी कर दी थी। लेकिन शादी के एक साल बाद ही पति-पत्नी के बीच छोटी-छोटी बातों को लेकर झगड़े शुरू हो गए।

पत्नी को अपने पति और ससुराल वालों में केवल कमियाँ ही दिखाई देती थीं। पति कुछ भी करता, उसे गलत ही लगता। सास कुछ कहती तो उसमें भी उसे बुराई नजर आती। धीरे-धीरे घर का माहौल इतना खराब हो गया कि बात तलाक तक पहुँचने लगी।

दो बच्चे भी थे। इसलिए दोनों किसी तरह रिश्ता निभा रहे थे, लेकिन घर में शांति नाम की कोई चीज नहीं थी।

जो भी रिश्तेदार या पड़ोसी उनके घर आता, पत्नी अपने पति की कमियाँ गिनाने लगती।

“इनके साथ रहना मेरे लिए असंभव है। इनमें एक भी अच्छाई नहीं है। मैं तो बच्चों की वजह से बस जिंदगी काट रही हूँ।”

मुहल्ले में भी उनके झगड़ों की चर्चा होने लगी थी। दोनों परिवारों ने बहुत समझाया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

एक दिन दोपहर के समय एक सब्जी वाला उनके घर आया।

“बहन जी, सब्जी ले लो… आज ताजी सब्जी है।”

महिला बाहर आई और बोली, “क्या-क्या है?”

सब्जी वाले ने कहा, “आलू, टमाटर, भिंडी, बैंगन और गोभी है।”

महिला ने टमाटर देखने शुरू किए। सब्जी वाले ने कहा, “बहन जी, टमाटर मत लेना। इनमें कुछ खराब हैं। आप आलू ले लीजिए, वे अच्छे हैं।”

महिला तुरंत बोली, “टमाटर ही चाहिए। जो खराब हैं, उन्हें मैं अलग कर दूँगी।”

उसने टमाटरों में से खराब टमाटर निकालकर किनारे कर दिए और अच्छे टमाटर अपनी टोकरी में रख लिए।

फिर वह भिंडी देखने लगी।

सब्जी वाला फिर बोला, “बहन जी, भिंडी भी मत लेना। इनमें कुछ खराब हैं। आलू ले लीजिए।”

महिला को गुस्सा आ गया।

“तुम कैसे सब्जी वाले हो? बार-बार आलू लेने को क्यों कह रहे हो? मुझे टमाटर और भिंडी चाहिए। खराब सब्जी मैं खुद छांट सकती हूँ।”

सब्जी वाला मुस्कुराया और बोला—

“बहन जी, बिल्कुल छांट सकती हैं। आपने अभी खराब टमाटर अलग कर दिए और अच्छी भिंडी भी चुन ली। आपको खराब और अच्छी सब्जी में फर्क करना आता है।”

महिला बोली, “तो इसमें इतनी बड़ी बात क्या है?”

सब्जी वाला गंभीर होकर बोला—

“बात बहुत बड़ी है बहन जी। आप सब्जियों में से अच्छाई चुन लेती हैं, लेकिन रिश्तों में ऐसा क्यों नहीं करतीं?”

महिला चुप हो गई।

सब्जी वाला आगे बोला—

“मेरी टोकरी में कुछ टमाटर खराब थे, लेकिन सारे नहीं। कुछ भिंडियाँ खराब थीं, लेकिन सारी नहीं। आपने खराब को अलग किया और अच्छी सब्जी अपने काम की रख ली। ठीक इसी तरह हर इंसान में कुछ कमियाँ होती हैं और कुछ अच्छाइयाँ भी।”

“अगर आप अपने पति की दस कमियों के साथ उनकी एक अच्छाई भी देख लें, सास की शिकायतों के साथ उनका प्यार भी समझ लें, तो शायद आपका घर फिर से खुशियों से भर जाए।”

महिला की आँखें नम हो गईं।

उसे पहली बार एहसास हुआ कि वह वर्षों से अपने रिश्तों में केवल खराब टमाटर ढूंढ रही थी, जबकि अच्छे टमाटर उसके सामने ही पड़े थे।

उस शाम उसने पति से बिना शिकायत किए प्यार से बात की। सास के पास जाकर बैठी और मुस्कुराकर बोली, “माँ जी, आज सब्जी मैं बनाऊँगी।”

उस दिन घर में वर्षों बाद हँसी सुनाई दी।

सब्जी वाला तो चला गया, लेकिन अपने पीछे एक बहुत बड़ी सीख छोड़ गया—

“रिश्ते कभी पूर्ण नहीं होते। उनमें से अच्छाई को छांटकर अपनाना पड़ता है और कमियों को समझदारी से किनारे करना पड़ता है।”

उस दिन से उस घर में सब्जियाँ ही नहीं, रिश्ते भी छांटकर सँवारे जाने लगे।

 

* राम कुमार दीक्षित पत्रकार       !

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