” नारायण के बिना लक्ष्मी कहाँ “

एक बार भगवान नारायण ने माता लक्ष्मी से कहा, “देवी! आजकल लोगों में मेरी भक्ति बहुत बढ़ गई है। हर ओर लोग ‘नारायण-नारायण’ का जाप करते दिखाई देते हैं।”

माता लक्ष्मी मुस्कुराईं और बोलीं, “प्रभु! लोग आपको पाने के लिए नहीं, बल्कि मुझे पाने के लिए आपकी भक्ति कर रहे हैं।”

भगवान नारायण ने कहा, “लेकिन लोग ‘लक्ष्मी-लक्ष्मी’ का जाप तो नहीं करते!”

माता लक्ष्मी बोलीं, “यदि आपको विश्वास नहीं है तो इसकी परीक्षा कर लीजिए।”

भगवान नारायण एक ब्राह्मण का रूप धारण करके एक गाँव में पहुँचे। उन्होंने एक घर का दरवाजा खटखटाया। घर के मुखिया ने दरवाजा खोला तो ब्राह्मण ने कहा, “मैं आपके गाँव में कुछ दिनों तक भगवान की कथा और कीर्तन करना चाहता हूँ।”

सेठ ने आदरपूर्वक कहा, “महाराज! जब तक कथा चले, आप मेरे घर में ही रहिए।”

गाँव में कथा का आयोजन शुरू हो गया। पहले दिन कुछ लोग आए, दूसरे दिन संख्या बढ़ी और तीसरे दिन तो बड़ी भीड़ एकत्र हो गई। भगवान नारायण मन ही मन प्रसन्न हुए कि लोगों की भक्ति कितनी बढ़ गई है।

तभी माता लक्ष्मी ने उनकी परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने एक वृद्ध महिला का रूप धारण किया और गाँव में पहुँचीं।

एक महिला कथा में जाने के लिए घर पर ताला लगा रही थी। वृद्धा ने उससे कहा, “बेटी, बहुत प्यास लगी है, थोड़ा पानी पिला दे।”

महिला ने जल्दी में कहा, “माताजी, मुझे कथा में जाने में देर हो रही है।”

वृद्धा के आग्रह पर उसने पानी से भरा एक स्टील का गिलास दे दिया। वृद्धा ने पानी पिया और गिलास वापस कर दिया। महिला ने देखा तो वह गिलास सोने का हो चुका था!

महिला आश्चर्यचकित रह गई। उसने सोचा, “यदि माताजी भोजन करेंगी तो शायद थाली और सारे बर्तन भी सोने के हो जाएँगे।”

उसने वृद्धा से भोजन करने का आग्रह किया, लेकिन लक्ष्मी जी ने कहा, “तुम कथा में जाओ बेटी, देर हो जाएगी।”

महिला कथा में पहुँची और उसने यह चमत्कार दूसरी महिलाओं को बता दिया। बस फिर क्या था! कई महिलाएँ कथा बीच में छोड़कर उस वृद्धा को खोजने निकल पड़ीं।

अगले दिन कथा में भीड़ कम हो गई। भगवान नारायण ने कारण पूछा तो लोगों ने बताया कि गाँव में एक ऐसी माता आई हैं, जिनके स्पर्श से बर्तन सोने के हो जाते हैं।

सेठ भी यह सुनकर तुरंत कथा छोड़कर माता लक्ष्मी के पास पहुँच गया। उसने कहा, “माता! मैं तो भगवान की कथा करवा रहा हूँ, फिर आपने मेरे घर को क्यों छोड़ दिया?”

माता ने कहा, “तुम्हारे घर मैं अवश्य आती, लेकिन जब तक तुम्हारे घर में कथा करने वाला संत रहेगा, मैं कैसे आऊँ?”

सेठ ने तुरंत कहा, “बस इतनी-सी बात! मैं अभी उन्हें धर्मशाला में ठहरा देता हूँ।”

जब भगवान कथा समाप्त करके घर लौटे तो सेठ ने उनसे कहा, “महाराज, अब आपकी व्यवस्था धर्मशाला में कर दी गई है।”

भगवान नारायण समझ गए कि परीक्षा पूरी हो चुकी है।

तभी माता लक्ष्मी प्रकट हुईं और बोलीं, “प्रभु! अब तो मान गए?”

भगवान मुस्कुराकर बोले, “हाँ देवी, तुम्हारा प्रभाव तो अद्भुत है। लेकिन एक सत्य तुम्हें भी मानना होगा—जहाँ नारायण का वास होता है, वहाँ लक्ष्मी स्वयं चली आती हैं।”

अगले दिन लक्ष्मी जी जाने लगीं। गाँव वालों ने पूछा, “माता, आप हमें छोड़कर क्यों जा रही हैं?”

माता बोलीं, “तुमने नारायण को ही अपने घर से निकाल दिया। मैं नारायण के बिना कैसे रह सकती हूँ?”

यह कहकर माता लक्ष्मी भी वहाँ से चली गईं।

 

धन जीवन के लिए आवश्यक है, लेकिन धन ही जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं होना चाहिए। जहाँ नारायण की भक्ति, सत्य, सेवा और सदाचार होते हैं, वहाँ लक्ष्मी का वास अपने आप होता है।

इसलिए केवल लक्ष्मी के पीछे मत भागिए, पहले नारायण को अपने हृदय में स्थान दीजिए।

जहाँ परमात्मा की याद होती है,
वहाँ सुख-समृद्धि स्वयं चली आती है !

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार       !

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