” योग्यता और मेहनत “

पुराने जमाने की बात है। एक मजदूर बिल्कुल अकेला था।

कभी आवश्यकता होती तो मजदूरी कर लेता तो कभी यूं ही रह जाता।

एक बार उसके पास खाने को कुछ नहीं था। वह घर से मजदूरी ढूंढने के लिए निकल पड़ा।

गर्मी का मौसम था और धूप बहुत तेज थी।

उसे एक व्यक्ति … दिखा जिसने एक भारी संदूक उठा रखा था।

उसने उस व्यक्ति से पूछा- क्या आपको मजदूर चाहिए ?

उस व्यक्ति को मजदूर की आवश्यकता भी थी, इस लिए उसने संदूक मजदूर को उठाने के लिए दे दिया।

संदूक को कंधे पर रखकर मजदूर चलने लगा।

गरीबी के कारण उसके पैरों में जूते नहीं थे। सड़क की जलन से बचने के लिए कभी-कभी वह किसी पेड़ की छाया में थोड़ी देर खड़ा हो जाता था।

पैर जलने से वह मन-ही-मन झुंझला उठा और उस व्यक्ति से बोला- ईश्वर भी कैसा अन्यायी है।

हम गरीबों को जूते पहनने लायक पैसे भी नहीं दिए।

मजदूर की बात सुनकर व्यक्ति खामोश रहा।

दोनों थोड़ा आगे बढ़े ही थे कि तभी उन्हें एक ऐसा व्यक्ति दिखा जिसके पैर नहीं थे और वह जमीन पर घिसटते हुए चल रहा था।

यह देखकर वह व्यक्ति मजदूर से बोला- तुम्हारे पास तो जूते नहीं है, परंतु इसके तो पैर ही नहीं है।

जितना कष्ट तुम्हें हो रहा है, उससे कहीं अधिक कष्ट इस समय इस व्यक्ति को हो रहा होगा।

तुमसे भी छोटे और दुखी लोग संसार में हैं। तुम्हें जूते चाहिए तो अधिक मेहनत करो।

हिम्मत हार कर ईश्वर को दोष देने की जरूरत नहीं।

ईश्वर ने नकद पैसे तो आज तक किसी को भी नहीं दिए, परंतु मौके सभी को बराबर दिए हैं।

उस व्यक्ति की बातों का मजदूर पर गहरा असर हुआ।

वह उस दिन से अपनी कमियों को दूर कर अपनी योग्यता व मेहनत के बल पर बेहतर जीवन जीने का प्रयास करने लगा।

 

इसीलिए तो कहते हैं कि
हमें जो मिला है हमारे भाग्य से ज्यादा मिला है। यदि आपके पांव में जूते नहीं है तो अफसोस मत कीजिए क्योंकि दुनिया में कई लोगों के पास तो पांव ही नहीं है।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार        !

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