मोबाइल की स्क्रीन पर बेटे का नाम उभरते ही सावित्री चौंक गई। वर्षों बाद बेटे का फोन आया था। उसने काँपते हाथों से फोन उठाया।
“हैलो बेटा…”
“हैलो माँ, कैसी हो?”
“मैं ठीक हूँ दीपक। तुम कैसे हो?”
कुछ क्षण चुप रहने के बाद दीपक बोला, “माँ, सब कुछ ठीक नहीं है।”
सावित्री की चिंता बढ़ गई। “क्या हुआ बेटा?”
“माँ, तुमसे एक बात पूछनी थी… यह पितृदोष क्या होता है?”
सावित्री कुछ क्षण मौन रही। फिर बोली, “अचानक यह सवाल क्यों पूछ रहे हो?”
दीपक ने लंबी साँस ली। “पिताजी के जाने के बाद से व्यापार लगातार घाटे में जा रहा है। बच्चों की पढ़ाई भी ठीक से नहीं चल रही। घर में हर समय तनाव रहता है। मैंने इंटरनेट पर एक पंडित से बात की। उन्होंने कहा कि हमारे घर में पितृदोष है। बोले, इसका उपाय हरिद्वार में होगा और इसके लिए बहुत धन लगेगा। सोचा, पहले तुमसे पूछ लूँ।”
सावित्री की आँखें भर आईं।
वह कुछ देर तक चुप रही, फिर बहुत शांत स्वर में बोली, “बेटा, पितृदोष का अर्थ केवल ग्रह-नक्षत्रों से जोड़कर मत देखो। मेरे लिए इसका एक और अर्थ है, जो शायद तुमने कभी समझने की कोशिश नहीं की।”
दीपक चुप रहा।
सावित्री बोली, “तुम्हारे पिता ने पूरी जिंदगी तुम्हारी हर आवश्यकता पूरी करने में लगा दी। तुम्हारी पढ़ाई के लिए दिन-रात मेहनत की। तुम्हारे सपनों को अपना सपना समझा। तुम्हें अच्छे विद्यालय में पढ़ाया, तुम्हारे लिए घर बनाया और तुम्हारी खुशियों के लिए अपनी इच्छाएँ तक छोड़ दीं।”
“उन्हें बस एक आशा थी कि बुढ़ापे में बेटा उनके पास रहेगा, उनके दुख-सुख में साथ देगा।”
सावित्री की आवाज भर्रा गई।
“लेकिन तुम बड़े हुए तो तुम्हारे सपने बड़े हो गए। तुम विदेश चले गए। नई दुनिया, नया जीवन और नई जिम्मेदारियाँ मिल गईं। तुम्हारे पिता वहीं रह गए—उसी घर में, उन्हीं दीवारों के बीच।”
दीपक की आँखों के सामने पिता का चेहरा घूम गया।
सावित्री आगे बोली, “जब तुम्हारे पिता बीमार पड़े थे, तब उन्हें तुम्हारी सबसे ज्यादा आवश्यकता थी। वे बार-बार कहते थे—‘दीपक को बुला लो।’ लेकिन तुम काम में व्यस्त थे। तुमने फोन पर हाल पूछ लिया और समझ लिया कि तुम्हारा कर्तव्य पूरा हो गया।”
“जिस पिता ने तुम्हें चलना सिखाया, वे अपने अंतिम दिनों में तुम्हारे कदमों की आहट सुनना चाहते थे।”
फोन के दोनों ओर गहरी खामोशी छा गई।
सावित्री ने आँसू पोंछते हुए कहा, “और जब वे चले गए, तब भी तुम उनके अंतिम संस्कार में नहीं आ सके। किसी अजनबी ने उन्हें श्मशान तक पहुँचाया। बेटा, यही मेरे लिए सबसे बड़ा पितृदोष है—जब माता-पिता जीवन भर संतान के लिए जीते हैं और अंत में उसी संतान के समय के लिए तरस जाते हैं।”
दीपक फूट-फूटकर रो पड़ा।
“माँ… मुझे माफ कर दो।”
सावित्री भी रो रही थी, लेकिन उसने स्वयं को संभाला।
“माफी मुझसे नहीं, अपने पिता से माँगना। और अगर सच में पितृदोष का उपाय करना चाहते हो, तो केवल किसी अनुष्ठान में धन खर्च मत करना। अपने बच्चों को धन के साथ संस्कार देना। उन्हें सिखाना कि माता-पिता की सेवा कोई बोझ नहीं, बल्कि सौभाग्य है।”
“और हाँ, यदि तुम्हारे पिता की कोई अधूरी इच्छा है, तो उसे पूरा करने की कोशिश करना। किसी जरूरतमंद वृद्ध की सहायता करना। अपने माता-पिता के नाम से किसी भूखे को भोजन कराना। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण—अपने बच्चों के लिए ऐसा उदाहरण बनना कि वे कल तुम्हें अकेला न छोड़ें।”
दीपक की आवाज काँप रही थी।
“माँ, मैं वापस आना चाहता हूँ।”
सावित्री ने कहा, “बेटा, घर का दरवाजा आज भी खुला है। माँ का दिल भी।”
कुछ दिनों बाद दीपक भारत लौट आया। पिता की तस्वीर के सामने बैठकर उसने देर तक सिर झुकाए रखा।
उस दिन उसे समझ आया कि पितरों को केवल जल अर्पित करना ही श्रद्धा नहीं है; उनके दिए संस्कारों को अपने जीवन में उतारना भी सच्ची श्रद्धांजलि है।
पितृ पक्ष हमें केवल अपने पूर्वजों को याद करने का अवसर नहीं देता, बल्कि यह भी पूछता है—
“क्या हम अपने माता-पिता के साथ वह कर रहे हैं, जिसकी आशा हम अपने बच्चों से करते हैं?”
माता-पिता की सेवा जीवन में ही कर दीजिए, क्योंकि मृत्यु के बाद किया गया पछतावा कभी उनके चरणों तक नहीं पहुँचता।
सच्चा पितृदोष वही है, जब माता-पिता जीवित हों और संतान के पास उनके लिए समय न हो।
माता-पिता का सम्मान कीजिए। यही सबसे बड़ा संस्कार है, यही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
