एक बार एक विद्यालय में एक संत बच्चों को अच्छी बातें सिखाने के लिए आए। उन्होंने कहा, “बच्चों! जीवन बिल्कुल साँप-सीढ़ी के खेल जैसा है। कभी हमें सफलता मिलती है, तो कभी कठिनाइयाँ आती हैं। लेकिन जो हर परिस्थिति में मुस्कुराना सीख लेता है, वही सच्चा विजेता बनता है।”
उन्होंने बच्चों को एक छोटी-सी प्रेरणादायक कहानी भी सुनाई।
सत्संग समाप्त होने के बाद महात्मा जी सभी बच्चों को प्रसाद बाँटने लगे। सभी बच्चे अपनी-अपनी बारी से प्रसाद लेकर खुशी-खुशी चले जाते।
उसी समय एक छोटा-सा बालक आया। महात्मा जी ने उसे प्रसाद दिया। वह दौड़ता हुआ पीछे गया और अपने दोस्तों में प्रसाद बाँट दिया। फिर वह वापस आया। महात्मा जी ने उसे फिर प्रसाद दे दिया।
वह बालक बार-बार आता, प्रसाद लेता और अपने साथियों में बाँट देता। महात्मा जी भी हर बार मुस्कुराकर उसे फिर से प्रसाद देते रहे।
यह देखकर पास खड़े एक शिक्षक को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा, “गुरुदेव! यह बच्चा बार-बार प्रसाद ले रहा है, फिर भी आप इसे हर बार प्रसाद क्यों दे रहे हैं?”
महात्मा जी मुस्कुराए और बोले, “मैंने देखा कि यह बच्चा प्रसाद अपने लिए नहीं रखता। यह हर बार अपने मित्रों में बाँट देता है। जो दूसरों को देता है, उसे देने में मुझे भी आनंद आता है। जब तक यह बाँटता रहेगा, मैं इसे देता रहूँगा।”
फिर महात्मा जी ने सभी बच्चों से कहा, “बच्चों! जीवन का सबसे बड़ा नियम है—जो खुशी, प्रेम, सम्मान और सहायता दूसरों को देते हैं, वही कई गुना होकर हमारे पास लौटकर आती है। इसलिए हमेशा बाँटना सीखो, मदद करना सीखो और सबके साथ मिल-जुलकर रहो।”
उस दिन से सभी बच्चों ने निश्चय किया कि वे अपनी खुशियाँ, ज्ञान, समय और प्यार अपने मित्रों के साथ बाँटेंगे।
देना ही सबसे बड़ा पाना है।
जो दूसरों की मदद करता है, खुशियाँ बाँटता है और सबके साथ प्रेम से रहता है, उसके जीवन में सुख और सम्मान अपने आप आ जाते हैं।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
