” अनोखे रिश्तेदार “

त्रेतायुग का समय था। अयोध्या से कुछ दूर एक शांत वनप्रदेश में कामतानाथ जी नाम के एक सरल, दयालु और संत स्वभाव के गृहस्थ रहते थे। उनका मानना था कि संसार के हर जीव में भगवान का अंश है। इसलिए वे मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षियों से भी परिवार जैसा प्रेम करते थे।

एक दिन वे वन से सैर करके लौट रहे थे। उनके पीछे एक कुतिया और उसका छोटा बच्चा चलने लगे। पहले तो उन्होंने ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब दोनों उनकी कुटिया तक पहुँच गए तो कामतानाथ जी ने उन्हें दूध और रोटी खिलाई। इसके बाद यह रोज का क्रम बन गया। कुछ ही दिनों में दोनों उनके घर के सदस्य बन गए। उन्होंने कुतिया का नाम झूरी और उसके बच्चे का नाम झबला रख दिया।

एक दिन कामतानाथ जी को वन में एक घायल बंदरिया का बच्चा मिला। उन्होंने उसकी मरहम-पट्टी की और कई दिनों तक उसकी सेवा की। स्वस्थ होने पर उसकी माँ उसे लेने आई, लेकिन जाने के बजाय वह भी कामतानाथ जी के पास रहने लगी। कामतानाथ जी ने उसका नाम चिंकी और उसके बच्चे का नाम टीलू रख दिया।

धीरे-धीरे उनकी कुटिया पशु-पक्षियों का आश्रय बन गई। कबूतर छत पर रहने लगे, गौरैया आँगन में घोंसले बनाने लगीं और गिलहरियाँ उनके पास आकर बैठतीं। कामतानाथ जी सभी को दाना-पानी देते और कहते—

“जिस तरह प्रभु श्रीराम ने वनवास के दौरान वनवासियों और जीव-जंतुओं को अपनाया था, उसी तरह हमें भी इस सृष्टि के प्रत्येक प्राणी से प्रेम करना चाहिए।”

समय बीतता गया। एक दिन उनकी बेटी निधि अपने पति अनिल के साथ उनसे मिलने आई। घर में इतने पशु-पक्षियों को देखकर निधि बोली—

“पिताजी! आपने तो घर को चिड़ियाघर बना दिया है। इतना बड़ा घर किराए पर दे देते तो अच्छी आमदनी होती।”

कामतानाथ जी हँसकर बोले—

“बेटी, किरायेदार तो नहीं रखे, लेकिन भगवान ने मुझे रिश्तेदार जरूर दे दिए हैं। ये बोल नहीं सकते, लेकिन प्रेम करना जानते हैं।”

निधि मुस्कुरा दी।

कुछ वर्षों बाद एक सुबह झबला ने कामतानाथ जी को जगाने की कोशिश की, लेकिन वे नहीं उठे। झूरी ने उन्हें चाटा, चिंकी ने उन्हें हिलाया, पर शरीर में कोई हरकत नहीं हुई। सभी पशु-पक्षी उनके आसपास जमा हो गए।

चिंकी दौड़कर पड़ोस में रहने वाले सोहम के पास गई और उसके वस्त्र खींचकर उसे अपने साथ ले आई। सोहम ने वैद्य को बुलाया। वैद्य ने बताया कि कामतानाथ जी इस संसार में नहीं रहे।

यह समाचार सुनकर निधि और अनिल तुरंत पहुँचे।

निधि ने देखा—कबूतर, गौरैया, गिलहरियाँ, झूरी, झबला, चिंकी और टीलू सभी उनके शरीर के आसपास चुपचाप बैठे थे। मानो हर कोई अपने प्रिय संरक्षक के जाने का शोक मना रहा हो।

निधि फूट-फूटकर रो पड़ी।

सोहम ने कहा—

“दीदी, आपके पिता ने इन्हें सिर्फ भोजन नहीं दिया था, उन्होंने इन्हें परिवार दिया था। इसलिए आज ये भी अपने पिता को विदा करने आए हैं।”

अंतिम संस्कार के बाद जब सभी लोग चले गए तो अनिल ने पूछा—

“अब इस घर का क्या करेंगे?”

निधि ने अपने पिता के रिश्तेदारों की ओर देखा और कहा—

“करना क्या है? पिताजी के रिश्तेदार यहीं रहेंगे।”

उसने एक संस्था की सहायता से पूरे घर को जीव-जंतु संरक्षण केंद्र में बदल दिया। घायल पशु-पक्षियों का उपचार होने लगा और बेसहारा जीवों को आश्रय मिलने लगा।

केंद्र का नाम रखा गया—

“प्राणी सरंक्षण केन्द्र ”

निधि ने पिता की तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर कहा—

“पिताजी, आपने घर नहीं बनाया था… आपने एक परिवार बनाया था। अब मैं उस परिवार को आगे बढ़ाऊँगी।”

जिसे हम पराया समझकर दूर कर देते हैं, वही कभी-कभी हमारे जीवन का सबसे सच्चा रिश्तेदार बन जाता है। सच्ची विरासत धन नहीं, बल्कि प्रेम और करुणा है।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार       !

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