एक छोटे से कस्बे में रघुवीर शर्मा अपने परिवार के साथ रहते थे। परिवार में उनकी पत्नी सावित्री, बेटा मोहित और बेटी नेहा थी। रघुवीर शर्मा मेहनती थे, लेकिन स्वभाव से थोड़े कठोर थे। जब भी घर में कोई परेशानी आती, वे तुरंत परिवार वालों को दोष देने लगते। कभी बच्चों की पढ़ाई पर नाराज़ हो जाते, कभी पत्नी के निर्णयों पर। उन्हें लगता था कि परिवार उनकी बातें नहीं समझता।
एक दिन रघुवीर शर्मा का व्यापार अचानक घाटे में चला गया। वे बहुत परेशान रहने लगे। घर का माहौल भी तनावपूर्ण हो गया। उन्हें विश्वास था कि अब कोई उनका साथ नहीं देगा।
लेकिन हुआ इसके बिल्कुल विपरीत।
अगली सुबह उन्होंने देखा कि सावित्री ने अपने कुछ पुराने गहने निकालकर उनके सामने रख दिए। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “यदि इनसे आपका बोझ हल्का हो जाए तो मुझे बहुत खुशी होगी।”
रघुवीर शर्मा कुछ बोल ही नहीं पाए।
उधर बेटा मोहित, जो कॉलेज में पढ़ता था, शाम को एक छोटी-सी नौकरी करने लगा ताकि अपनी पढ़ाई का खर्च स्वयं उठा सके। बेटी नेहा ने भी अपनी छोटी-छोटी इच्छाएँ छोड़ दीं। उसने नए कपड़े और घूमने की जिद करना बंद कर दिया।
कुछ महीनों तक पूरा परिवार एकजुट होकर हर कठिनाई का सामना करता रहा। किसी ने शिकायत नहीं की। सबके चेहरे पर यही विश्वास था कि यदि परिवार साथ है, तो हर संकट छोटा है।
धीरे-धीरे व्यापार फिर से चल पड़ा। रघुवीर शर्मा का नुकसान पूरा होने लगा। एक दिन उन्होंने पूरे परिवार को अपने पास बुलाया और भावुक होकर बोले, “मैं हमेशा सोचता था कि जब कठिन समय आएगा तो मैं अकेला रह जाऊँगा। लेकिन आज समझ आया कि सच्चा परिवार वही होता है जो सुख में नहीं, दुख में भी हाथ थामे रखता है।”
सावित्री मुस्कुराकर बोली, “परिवार का अर्थ केवल साथ रहना नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में एक-दूसरे का सहारा बनना है।”
उस दिन रघुवीर शर्मा की आँखों में आँसू थे। उन्होंने महसूस किया कि परिवार की छोटी-छोटी बातें, त्याग और प्रेम ही जीवन की सबसे बड़ी पूँजी हैं। धन कभी कम-ज्यादा हो सकता है, लेकिन यदि परिवार में विश्वास, प्रेम और अपनापन बना रहे तो हर मुश्किल आसान हो जाती है।
उस दिन के बाद रघुवीर शर्मा ने कभी अपने परिवार की नीयत पर संदेह नहीं किया। उन्होंने हर परिस्थिति में अपने परिवार पर भरोसा करना सीख लिया। घर में पहले से अधिक प्रेम, सम्मान और खुशी रहने लगी।
जिस परिवार में विश्वास, त्याग और प्रेम होता है, वहाँ कठिन से कठिन समय भी बीत जाता है। परिवार की नीयत पर संदेह करने के बजाय उसके प्रेम और साथ का सम्मान करना चाहिए। याद रखिए, दुनिया में सबसे बड़ा सहारा धन नहीं, बल्कि अपना परिवार होता है।
“परिवार का साथ ही जीवन की सबसे बड़ी ताकत है। जहाँ विश्वास है, वहीं सच्चा सुख और समृद्धि है।”
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
